शबरी की कथा
यह कहानी शायद सबसे ज़्यादा दिल छूने वाली है। इसमें न कोई बड़ा युद्ध है, न कोई चमत्कार, बस एक बूढ़ी स्त्री का इंतज़ार है, और उसकी भक्ति है। कहते हैं कि सच्ची भक्ति में इतनी शक्ति होती है कि भगवान खुद चलकर आते हैं, और शबरी की कहानी इसी बात को साबित करती है।
कौन थीं शबरी
शबरी एक भील समुदाय की स्त्री थीं। जवानी में उनका विवाह होने वाला था, पर विवाह के समय जब उन्होंने देखा कि बारात में बहुत सारे पशु बलि के लिए लाए गए हैं, तो उनका मन दुखी हो गया। उसी रात वे घर छोड़कर जंगल की ओर चली गईं, और वहां उन्होंने ऋषि मतंग के आश्रम में शरण ली।
आश्रम में रहकर शबरी ने ऋषि मतंग की वर्षों तक निष्ठा से सेवा की। जब मतंग ऋषि का अंत समय आया, तो उन्होंने शबरी से कहा कि एक दिन स्वयं भगवान राम इस आश्रम में आएंगे, और तभी तक उन्हें उनकी प्रतीक्षा करनी होगी।
बरसों का इंतज़ार
ऋषि मतंग के जाने के बाद शबरी अकेली आश्रम में रहने लगीं। पर उनका इंतज़ार आसान नहीं था। साल बीतते गए, शबरी बूढ़ी होती गईं, पर उनकी श्रद्धा एक पल के लिए भी कम नहीं हुई। हर सुबह वे जंगल से सबसे मीठे बेर चुनकर लातीं, हर एक बेर को चख कर देखतीं कि वो मीठा है या नहीं, ताकि जब राम जी आएं तो उन्हें कोई खट्टा फल न मिले। और फिर वे रास्ते पर बैठकर, आंखें रास्ते पर टिकाए, राम जी का इंतज़ार करतीं।
गांव वाले उन्हें देखकर हंसते थे। इतने बरस हो गए, न कोई राम आया, न कोई आने की उम्मीद बची। पर शबरी को कभी संदेह नहीं हुआ। उनके मन में बस एक ही बात थी, गुरु ने जो कहा है वो सच होगा।
जब राम जी आए
और फिर वो दिन आया। सीता जी की खोज करते हुए भगवान राम और लक्ष्मण जी उसी जंगल से गुज़रे, और मतंग ऋषि के आश्रम की ओर आ पहुंचे। जब शबरी ने दूर से राम जी को आते देखा, तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। बरसों का इंतज़ार, उस एक पल में पूरा हो गया।
शबरी दौड़कर आईं, राम जी के चरणों में गिर पड़ीं। और फिर उन्होंने वही बेर, जो उन्होंने बरसों से चख चख कर, प्रेम से चुनकर रखे थे, राम जी को अर्पित किए। किसी और के लिए यह शायद असभ्यता होती, जूठे फल किसी को देना, पर राम जी ने बिना एक पल गंवाए वो बेर खाए, और बड़े प्रेम से खाए। उन्होंने कभी नहीं पूछा कि यह जूठा है या नहीं। उन्होंने बस देखा कि इसमें कितना प्रेम है।
राम जी ने क्या कहा
राम जी ने शबरी से कहा कि भक्ति का असली मतलब जाति, उम्र या पूजा-पाठ की विधि नहीं है, असली भक्ति तो प्रेम और श्रद्धा में है। उन्होंने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश दिया, यानी भक्ति के नौ प्रकार, और कहा कि जो भी सच्चे मन से इनका पालन करता है, वो मुझे पा सकता है, चाहे वो कोई भी हो।
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