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रामचरितमानस | बालकाण्ड, भाग 5

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 5

बालकाण्ड, भाग 5, आत्मचिंतन एवं राम की अपार महिमा

ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित

भाग 4 में हमने पढ़ा कि कैसे राम नाम किसी भी साधारण रचना को भी मूल्यवान बना देता है। इस भाग में तुलसीदास जी और गहराई से आत्मचिंतन करते हैं, यहां तक कि स्वयं को उन लोगों में भी गिनते हैं जो राम के नाम का दुरुपयोग करते हैं। यह भाग एक विनम्र संत के हृदय की सच्ची झलक दिखाता है, और अंत में राम की उस महिमा तक पहुंचता है जिसे स्वयं सरस्वती, शेष और शिव भी पूरी तरह वर्णन नहीं कर पाते।

राम प्रताप की महिमा

चौपाई
जदपि कबित रस एकउ नाहीं। राम प्रताप प्रगट एहि माहीं॥ सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बड़प्पनु पावा॥
यद्यपि मेरी इस रचना में काव्य-रस तो एक भी नहीं है, फिर भी इसमें श्रीरामजी का प्रताप प्रकट है। मेरे मन में यही एक भरोसा है, अच्छे संग से किसे बड़प्पन नहीं मिला?
चौपाई
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई॥ भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी॥
धुआं भी अगर (चंदन) के संग से अपनी स्वाभाविक कड़वाहट छोड़कर सुगंधित हो जाता है। मेरी रचना भले ही साधारण हो, पर इसमें वर्णित वस्तु (राम कथा) उत्तम है, जो जगत का कल्याण करने वाली है।

छंद, राम कथा की पवित्रता

छंद
मंगल करनि कलिमलहरनि तुलसी कथा रघुनाथ की। गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥ प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी। भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरघुनाथजी की यह कथा कल्याण करने वाली और कलियुग के पापों को हरने वाली है। मेरी इस भद्दी कविता की चाल भी नदी की भांति टेढ़ी है, पर यह पवित्र जलवाली नदी (गंगा) के समान बन जाएगी। प्रभु के सुंदर यश के संग से यह रचना भी सज्जनों के मन को भाने वाली हो जाएगी, जैसे श्मशान की राख भी शिवजी के अंग पर लगकर सुहावनी और पवित्र हो जाती है।
दोहा
प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग। दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥
राम के यश के संग से मेरी यह रचना सभी को अत्यंत प्रिय लगेगी। मलय पर्वत के संग से चंदन बना हुआ काठ भी वंदनीय हो जाता है, फिर उसकी तुच्छता का विचार कौन करता है?
दोहा
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान। गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥
काली गाय होने पर भी उसका दूध उज्ज्वल और गुणकारी होता है, इसलिए सब उसे पीते हैं। इसी तरह गंवारू भाषा में होने पर भी सीता-रामजी के यश को बुद्धिमान लोग बड़े चाव से गाते और सुनते हैं।

राम कथा के बिना सरस्वती की भी शोभा नहीं

चौपाई
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ॥ कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी॥
श्रीरामचरित्र रूपी सरोवर में नहलाए बिना सरस्वतीजी की वह थकावट करोड़ों उपायों से भी दूर नहीं होती। कवि और पंडित अपने हृदय में ऐसा विचार करके ही कलियुग के पापों को हरने वाले श्रीहरि के यश का गान करते हैं।
दोहा
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥
उन कवितारूपी मोतियों को युक्ति से बेधकर फिर रामचरित्ररूपी सुंदर धागे में पिरोया जाता है, जिसे सज्जन लोग अपने निर्मल हृदय में धारण करते हैं, जिससे अत्यंत प्रेमरूपी शोभा प्राप्त होती है।

आत्मचिंतन, दुरुपयोग करने वालों में स्वयं की गणना

चौपाई
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥ चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़े॥
जो भयंकर कलियुग में जन्मे हैं, जिनकी करनी कौए के समान है और वेष हंस के समान है, जो वेदमार्ग छोड़कर कुमार्ग पर चलते हैं, जो कपट की मूर्ति हैं और कलियुग के पापों के भांडे (पात्र) हैं।
चौपाई
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के॥ तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥
जो श्रीरामजी के भक्त कहलाकर लोगों को ठगते हैं, जो धन, क्रोध और काम के गुलाम हैं, उन धर्मध्वजियों (धर्म की झूठी ध्वजा फहराने वालों) में जगत में सबसे पहले मेरी ही गिनती है, यह मैं स्वयं स्वीकार करता हूं।
चौपाई
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ॥ ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने॥
यदि मैं अपने सभी अवगुण कहने लगूं तो कथा बहुत बढ़ जाएगी और मैं उसका पार नहीं पाऊंगा। इसलिए मैंने बहुत कम अवगुणों का वर्णन किया है, बुद्धिमान लोग इतने से ही समझ लेंगे।

राम की अपार महिमा, नेति-नेति

चौपाई
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ॥ कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥
मैं न तो कवि हूं, न चतुर कहलाता हूं, मैं तो बस अपनी बुद्धि के अनुसार श्रीरामजी के गुण गाता हूं। कहां श्रीरघुनाथजी का अपार चरित्र, और कहां संसार में आसक्त मेरी बुद्धि?
चौपाई
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥ समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥
जिस हवा से सुमेरु जैसा पहाड़ उड़ जाता है, बताइए, उसके सामने रुई किस गिनती में है? श्रीरामजी की असीम प्रभुता को समझते हुए यह कथा रचने में मेरा मन बहुत हिचकता है।
दोहा
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान। नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥
सरस्वती जी, शेषनाग जी, शिवजी, ब्रह्माजी, शास्त्र, वेद और पुराण, ये सब जिनके गुणों का “नेति-नेति” (यह भी नहीं, यह भी नहीं) कहकर निरंतर गान करते हैं, अर्थात जिनके गुणों का पूरी तरह वर्णन कभी नहीं हो पाता।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ १५ से १७ तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 6 में ग्रंथ रचना का उद्देश्य एवं अयोध्या वर्णन की भूमिका
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