🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 6
बालकाण्ड, भाग 6, महाकवियों को श्रद्धांजलि
ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित
भाग 5 में तुलसीदास जी ने राम की अपार महिमा के आगे अपनी सीमाओं को स्वीकार किया। इस भाग में वे बताते हैं कि कैसे महर्षि वाल्मीकि और वेदव्यास जैसे महाकवियों के बल पर वे स्वयं यह कठिन कार्य करने का साहस जुटाते हैं, और फिर सभी भूत, वर्तमान और भविष्य के कवियों को भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं।
भगवान की अवतार लीला का कारण
चौपाई
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥
यद्यपि प्रभु की उस प्रभुता को सब जानते हैं, फिर भी उसे कहे बिना कोई रह नहीं पाता। इसमें वेदों ने यह कारण बताया है कि भगवान के भजन का प्रभाव अनेक प्रकार से वर्णन करना चाहिए।
चौपाई
एक अनीह अरूप अनामा। अज सचिदानंद पर धामा॥
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना॥
जो परमेश्वर एक हैं, जिनकी कोई इच्छा नहीं, जिनका कोई रूप-नाम नहीं, जो अजन्मा, सच्चिदानंद और परमधाम हैं, तथा जो सर्वव्यापक और विश्वरूप भगवान हैं, उन्होंने ही दिव्य शरीर धारण करके नाना प्रकार की लीलाएं की हैं।
चौपाई
सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥
वह लीला केवल भक्तों के हित के लिए है, क्योंकि भगवान परम कृपालु और शरणागतों के प्रेमी हैं। जिनकी अपने भक्तों पर बड़ी ममता और स्नेह है, जिन्होंने करुणा करके कभी क्रोध नहीं किया।
वाल्मीकि-व्यास के बल पर साहस
चौपाई
तेहि बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा॥
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई॥
उसी बल से मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथा, राम के चरणों में सिर नवाकर कहूंगा। मुनियों ने पहले ही श्रीहरि की कीर्ति गाई है, उसी मार्ग पर चलना मेरे लिए सुगम होगा।
दोहा
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥
जो अत्यंत बड़ी और श्रेष्ठ नदियां हैं, यदि राजा उन पर पुल बनवा दे, तो अत्यंत छोटी चींटियां भी उस पुल पर चढ़कर बिना परिश्रम के पार चली जाती हैं। (इसी तरह मुनियों के वर्णन के सहारे मैं भी रामचरित्र का वर्णन सहज ही कर सकूंगा।)
चौपाई
एहि प्रकार बल मनहिं देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥
इस प्रकार अपने मन को बल दिखाकर मैं श्रीरघुनाथजी की सुहावनी कथा की रचना करूंगा। व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि हो गए हैं, जिन्होंने बड़े आदर से श्रीहरि के सुयश का वर्णन किया है।
सभी कवियों को वंदना
चौपाई
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥
मैं उन सभी श्रेष्ठ कवियों के चरण-कमलों की वंदना करता हूं, वे मेरे सभी मनोरथ पूर्ण करें। जो सामान्य भाषा के कवि परम बुद्धिमान हैं, जिन्होंने भाषा में श्रीहरि के चरित्र का वर्णन किया है।
चौपाई
भए जे अहिं जे होइहहिं आगे। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागे॥
होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥
जो हो चुके हैं, जो अभी हैं, और जो आगे होंगे, उन सभी कवियों को मैं सारा कपट त्यागकर प्रणाम करता हूं। आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिए कि साधु-समाज में मेरी रचना का सम्मान हो।
निर्मल कीर्ति की कामना
चौपाई
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अंदेसा॥
वही कीर्ति, कविता और संपत्ति उत्तम है जो गंगाजी की तरह सबका हित करने वाली हो। श्रीरामजी की कीर्ति तो बहुत सुंदर है, पर मेरी कविता भद्दी है, यही असमंजस मुझे चिंता में डालता है।
दोहा
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥
चतुर पुरुष उसी कविता का आदर करते हैं जो सरल हो और जिसमें निर्मल चरित्र का वर्णन हो, तथा जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक वैर भूलकर सराहना करने लगें।
सोरठा
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥
मैं उन वाल्मीकि मुनि के चरण-कमलों की वंदना करता हूं, जिन्होंने रामायण की रचना की है, जो खर (कठोर) होते हुए भी बड़ी कोमल और सुंदर है तथा दूषण (राक्षस) सहित होने पर भी दोष रहित है (यह वाल्मीकि जी के नाम में छिपे शब्दों “खर” और “दूषण” के साथ भी सुंदर श्लेष है, जो रामायण के दो राक्षस पात्रों के भी नाम हैं)।
चौपाई
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥
मैं चारों वेदों की वंदना करता हूं, जो संसाररूपी समुद्र से पार होने के लिए जहाज़ के समान हैं, जिन्हें श्रीरघुनाथजी के निर्मल यश का वर्णन करते हुए स्वप्न में भी थकावट नहीं होती।
चौपाई
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥
मैं ब्रह्माजी के चरणों की धूल की वंदना करता हूं, जिन्होंने यह संसाररूपी सागर बनाया, जहां से संतरूपी अमृत, चंद्रमा और कामधेनु प्रकट हुए, वहीं दुष्टरूपी विष और मदिरा भी प्रकट हुए।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ १८ से २० तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 7 में शिव वंदना एवं कथा प्रारंभ की भूमिका
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