🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 9
बालकाण्ड, भाग 9, नाम और ब्रह्म का गूढ़ रहस्य
ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित
भाग 8 में हमने “राम” नाम के दो अक्षरों की महिमा पढ़ी। इस भाग में तुलसीदास जी और गहराई में जाते हैं, नाम और रूप के संबंध को समझाते हुए, और अंततः एक साहसिक बात कहते हैं, अपने विचार के अनुसार नाम, स्वयं राम से भी बड़ा है। यह रामचरितमानस के सबसे गहन दार्शनिक अंशों में से एक है।
नाम और रूप का संबंध
चौपाई
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसमुझि साधी॥
समझने में नाम और नामी (जिसका नाम है, राम स्वयं) दोनों एक-से हैं, परन्तु दोनोंमें परस्पर स्वामी और सेवकके समान प्रीति है, प्रभु श्रीरामजी अपने ‘राम’ नामका ही अनुगमन करते हैं। नाम और रूप दोनों ईश्वरकी उपाधि हैं, ये दोनों अनिर्वचनीय, अनादि हैं और सुंदर बुद्धिसे ही इनका स्वरूप जाना जाता है।
चौपाई
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥
इनमें कौन बड़ा है, कौन छोटा, यह कहना ही अपराध है। इनके गुणोंका तारतम्य सुनकर साधु पुरुष स्वयं ही समझ लेंगे। रूप नामके अधीन देखे जाते हैं, नामके बिना रूपका ज्ञान नहीं हो सकता।
दोहा
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥
तुलसीदासजी कहते हैं, यदि तू भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहता है तो मुखरूपी द्वारकी जीभरूपी देहलीपर रामनामरूपी मणि-दीपकको रख।
चार प्रकार के भक्तों को नाम का फल
चौपाई
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥
भारी दुख से आर्त भक्त जब नामजप करते हैं तो उनके बड़े-बड़े संकट मिट जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं। जगत में राम भक्त चार प्रकार के हैं, चारों ही पुण्यात्मा, पापरहित और उदार हैं।
दोहा
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन॥
जो सब प्रकार की कामनाओं से रहित होकर श्रीरामभक्तिरसमें लीन हैं, उन्होंने भी नामके सुंदर प्रेमरूपी अमृतके सरोवरमें अपने मनको मछली बना रखा है, अर्थात वे नामरूपी सुधाका निरंतर आस्वादन करते रहते हैं, क्षणभर भी उससे अलग होना नहीं चाहते।
नाम, अग्नि के दृष्टांत से समझाया गया
चौपाई
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥
निर्गुण और सगुण, ब्रह्मके ये दोनों स्वरूप हैं, ये दोनों ही अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। मेरे मतमें नाम इन दोनोंसे बड़ा है, जिसने अपने बलसे दोनोंको अपने वशमें कर रखा है।
चौपाई
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें॥
निर्गुण उस अप्रकट अग्निके समान है जो काठके अंदर है, परन्तु दीखती नहीं; और सगुण उस प्रकट अग्निके समान है जो प्रत्यक्ष दीखती है। ये दोनों ही तत्त्वतः एक ही हैं। दोनों प्रकारका ब्रह्मज्ञान अत्यंत कठिन है, परन्तु नामसे दोनों सुगम हो जाते हैं। इसीसे मैंने नामको ब्रह्मसे और साक्षात रामसे भी बड़ा कहा है।
नाम की महिमा का समापन
चौपाई
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥
ऐसे विकाररहित प्रभुके हृदयमें रहते हुए भी जगत्के सब जीव दीन और दुखी हैं। नामके यथार्थ स्वरूपको जानकर, श्रद्धापूर्वक नामका जतन (साधन) करनेसे वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्नके जाननेसे उसका मूल्य (प्रकट होता है)।
दोहा
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार॥
इस प्रकार निर्गुणसे भी नामका प्रभाव अत्यंत बड़ा है। अब अपने विचारके अनुसार कहता हूं कि नाम साक्षात रामसे भी बड़ा है।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ ४३ से ४५ तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 10 में नाम महिमा का समापन एवं कवि की अंतिम विनती
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