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रामचरितमानस | बालकाण्ड, भाग 11

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 11

बालकाण्ड, भाग 11, ध्रुव, अजामिल की मिसालें एवं कवि की प्रार्थना

ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित

भाग 10 में हमने पहला विश्राम पार किया। इस भाग में तुलसीदास जी कुछ प्रसिद्ध उदाहरणों से नाम की शक्ति सिद्ध करते हैं, ध्रुव, अजामिल, गज और गणिका जैसे पात्रों का ज़िक्र आता है, और यहीं वह प्रसिद्ध दोहा भी आता है जिसमें तुलसीदास जी स्वयं अपने नाम पर सुंदर श्लेष करते हैं। इस भाग के अंत में कवि अपनी व्यक्तिगत प्रार्थना की ओर मुड़ते हैं।

ध्रुव और अजामिल के उदाहरण

चौपाई
धुर्वँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥ सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥
ध्रुवजीने ग्लानिसे (विमाताके वचनोंसे दुखी होकर सकामभावसे) हरिनामको जपा और उसके प्रतापसे अचल अनुपम स्थान (ध्रुवलोक) प्राप्त किया। हनुमान्जीने पवित्र नामका स्मरण करके श्रीरामजीको अपने वशमें कर रखा है।
चौपाई
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥ कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥
नीच अजामिल, गज और गणिका (वेश्या) भी श्रीहरिके नामके प्रभावसे मुक्त हो गये। मैं नामकी बड़ाई कहाँतक कहूं, राम भी नामके गुणोंको नहीं गा सकते।

तुलसीदास जी का अपने नाम पर श्लेष

दोहा
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु। जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥
कलियुगमें रामका नाम कल्पतरु (मनचाहा पदार्थ देनेवाला) और कल्याणका निवास (मुक्तिका घर) है, जिसको स्मरण करनेसे भाँग-सा (निकृष्ट) तुलसीदास तुलसीके समान पवित्र हो गया। (यहां तुलसीदासजी बड़ी विनम्रता से अपनी तुलना भांग जैसी तुच्छ वस्तुसे करते हैं, और कहते हैं कि नामके प्रभावसे ही वे तुलसी जैसे पवित्र बन पाये।)

चार युगों में नाम की व्यापकता

चौपाई
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥ बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥
चारों युगोंमें, तीनों कालोंमें और तीनों लोकोंमें नामको जपकर जीव शोकरहित हुए हैं। वेद, पुराण और संतोंका मत यही है कि समस्त पुण्योंका फल श्रीरामजीमें प्रेम होना है।
चौपाई
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥ कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
पहले (सत्य) युगमें ध्यानसे, दूसरे (त्रेता) युगमें यज्ञसे और द्वापरमें पूजनसे भगवान् प्रसन्न होते हैं; परंतु कलियुगमें केवल पापकी जड़ और मलिन है, इसमें मनुष्योंका मन पापरूपी समुद्रमें मछली बना हुआ है।
चौपाई
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥ राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥
ऐसे कराल कलियुगकालमें तो नाम ही कल्पवृक्ष है, जो स्मरण करते ही संसारके जंजालोंका नाश कर देनेवाला है। कलियुगमें यह रामनाम मनोवाञ्छित फल देनेवाला है, परलोकका परम हितैषी और इस लोकका माता-पिता है।
चौपाई
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥ कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
कलियुगमें न कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है; रामनाम ही एक आधार है। कपटकी खान कलियुगरूपी कालनेमिके मारनेके लिये रामनाम ही बुद्धिमान् और समर्थ श्रीहनुमान्जी हैं।

नरसिंह के समान राम नाम

दोहा
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल। जापक जन प्रह्लाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥
रामनाम श्रीनृसिंह भगवान् है, कलियुग हिरण्यकशिपु है और जप करनेवाले जन प्रह्लादके समान हैं; यह रामनाम देवताओंके शत्रु (कलियुगरूपी दैत्य) को मारकर जप करनेवालोंकी रक्षा करेगा।
चौपाई
भायँ कुभायँ अनख आलसहुँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहुँ॥ सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोधसे या आलस्यसे, किसी तरहसे भी नाम जपनेसे दसों दिशाओंमें कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) रामनामका स्मरण करके और श्रीरघुनाथजीको मस्तक नवाकर मैं रामजीके गुणोंका वर्णन करता हूं।

कवि की व्यक्तिगत प्रार्थना

चौपाई
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥ राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥
वे (श्रीरामजी) मेरी [बिगड़ी] सब तरहसे सुधार लेंगे; जिनकी कृपा कृपा करनेसे नहीं अघाती। राम-से उत्तम स्वामी और मुझ-सरीखा बुरा सेवक! इतनेपर भी उन दयानिधिने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया।
चौपाई
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥ गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥
लोक और वेदमें भी अच्छे स्वामीकी यही रीति प्रसिद्ध है कि वह विनय सुनते ही प्रेमको पहचान लेता है। अमीर-गरीब, गँवार-नगरनिवासी, पण्डित-मूर्ख, बदनाम-यशस्वी।
चौपाई
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥ साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥
सुकवि और कुकवि, अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार, सब नर-नारी राजाकी सराहना करते हैं। साधु, सुजान, सुशील राजा ईश्वरका अंश होता है, और संसारमें परम कृपालु होता है।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ ४८ से ४९ तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 12 में कवि की प्रार्थना का शेष भाग एवं अयोध्या नगरी का विस्तृत वर्णन
◄ भाग 10 भाग 11 of ~15-20 भाग 12 →
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