|| ॐ श्री गणेशाय नमः || सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः || असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ||

भक्त ध्रुव की अटल तपस्या और अखंड पद: देवर्षि नारद का उपदेश, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र एवं ध्रुव तारा

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
📲 WhatsApp शेयर
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण प्रसंग • चतुर्थ स्कंध ॥

सनातन धर्म में भक्ति, संकल्प और अविचल निष्ठा का सर्वोत्कृष्ट आदर्श बालक ध्रुव की पावन कथा है। श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कंध में वर्णित यह प्रसंग हमें सिखाता है कि यदि हृदय में ईश्वर प्राप्ति की सच्ची पिपासा और दृढ़ संकल्प हो, तो मात्र पांच वर्ष का बालक भी संपूर्ण चराचर जगत के स्वामी भगवान श्रीहरि विष्णु को प्रत्यक्ष दर्शन देने पर विवश कर सकता है। आज के इस पावन लेख में हम भक्त ध्रुव की कठिन तपस्या, देवर्षि नारद के दिव्य उपदेश और आकाश में प्राप्त अखंड ध्रुव पद का प्रामाणिक विवेचन करेंगे।

१. राजदरबार की कटु वाणी और बालक का आघात

स्वायंभुव मनु के तेजस्वी पुत्र राजा उत्तानपाद की दो रानियां थीं—सुनीति (बड़ी रानी) और सुरुचि (छोटी रानी)। राजा सुरुचि पर विशेष आसक्त थे। सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम था और सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव था।

एक दिन पांच वर्षीय बालक ध्रुव ने देखा कि उसका छोटा भाई उत्तम पिता की गोद में बैठा क्रीड़ा कर रहा है। बालक ध्रुव भी बाल-सुलभ इच्छा से पिता की गोद में बैठने दौड़ा। तभी सौतेली माता सुरुचि ने अहंकारवश ध्रुव का हाथ पकड़कर खींच लिया और अत्यंत मर्मवेधी स्वर में कहा:

“वत्स! तुम राजा की गोद में बैठने के अधिकारी नहीं हो। यद्यपि तुम भी राजा के ही पुत्र हो, किंतु तुमने मेरे गर्भ से जन्म नहीं लिया है। यदि तुम राजसिंहासन चाहते हो, तो तपस्या करके भगवान नारायण को प्रसन्न करो और उनके वरदान से मेरे गर्भ से पुनः जन्म लो।”

राजा उत्तानपाद सुरुचि के भय से चुप रहे। अपमान से आहत होकर रोते हुए बालक ध्रुव अपनी माता सुनीति के पास पहुंचा। माता सुनीति ने ध्रुव को सांत्वना देते हुए कहा—”पुत्र! तुम्हारी सौतेली माता ने यद्यपि कठोर वचन कहे हैं, किंतु वे सत्य हैं। संसार के किसी मनुष्य के सम्मुख हाथ फैलाने से कुछ नहीं मिलेगा। केवल अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक भगवान श्रीहरि विष्णु ही तुम्हारे कष्टों को हर सकते हैं। उन्हीं के चरणों की शरण लो।”

२. वन गमन और देवर्षि नारद का साक्षात्कार

माता के वचनों को ब्रह्मवाक्य मानकर बालक ध्रुव उसी क्षण राजप्रासाद त्यागकर तपस्या हेतु वन की ओर चल पड़ा। मार्ग में उनकी अविचल श्रद्धा देखकर देवर्षि नारद प्रकट हुए। नारद जी ने बालक की परीक्षा लेते हुए कहा—”वत्स! तुम सुकुमार बालक हो। मान-अपमान तो संसार का स्वभाव है। घर लौट जाओ, इस अवस्था में कठोर तपस्या असंभव है।”

ध्रुव ने हाथ जोड़कर कहा—”हे देवर्षि! क्षत्रिय हृदय में अपमान का जो बाण लगा है, वह सांसारिक वचनों से शांत नहीं हो सकता। मुझे तो ऐसा अविचल पद चाहिए जो मेरे पिता-प्रपिता किसी को भी प्राप्त न हुआ हो। कृपा कर मुझे साधना का मार्ग दिखाइए।”

३. द्वादशाक्षर महामंत्र की दीक्षा

बालक की अडिग निष्ठा देखकर देवर्षि नारद परम प्रसन्न हुए और उन्होंने यमुना तट पर स्थित पावन मधुवन में तपस्या करने का आदेश दिया। नारद जी ने ध्रुव को परम कल्याणकारी द्वादशाक्षर मंत्र की दीक्षा दी:

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
भावार्थ: मैं सर्वव्यापी, परम चेतना रूप भगवान वासुदेव श्रीहरि के श्रीचरणों में बारंबार नमन करता हूं।

४. मधुवन की छह मास की कठोर तपस्या

तपस्या का मास आहार एवं नियम साधना की स्थिति
प्रथम मास प्रत्येक तीन दिन में केवल कैथ और बेर भगवान नारायण के स्वरूप का निरंतर मानस ध्यान
द्वितीय मास प्रत्येक छह दिन में सूखे पत्ते और घास एकाग्र चित्त, बाह्य चेतना का तिरोधान
तृतीय मास प्रत्येक नौ दिन में केवल जल का पान प्राणों पर नियंत्रण, सर्व व्याधियों से मुक्ति
चतुर्थ मास प्रत्येक बारह दिन में केवल वायु का भक्षण एक पैर पर खड़े होकर अनन्य ध्यान
पंचम-छठा मास पूर्ण निराहार, श्वास का भी निरोध ध्रुव के तेज से संपूर्ण त्रिलोकी का कंपायमान होना

५. भगवान श्रीहरि का शंख स्पर्श एवं अखंड पद प्राप्ति

ध्रुव की प्राण वायु के निरोध से जब तीनों लोकों में हाहाकार मच गया, तब भगवान विष्णु अपने गरुड़ पर सवार होकर मधुवन में प्रकट हुए। ध्रुव के हृदय कमल में जो चतुर्भुज रूप प्रकाशित था, भगवान ने अंतःकरण से वह स्वरूप ओझल कर दिया। जैसे ही बालक ने नेत्र खोले, साक्षात शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी श्रीहरि सम्मुख खड़े थे।

बालक ध्रुव स्तब्ध रह गया। तब करुणासिंधु प्रभु ने अपने दिव्य पाञ्चजन्य शंख का स्पर्श बालक के कपोल (गाल) से कराया। शंख का स्पर्श होते ही बालक के कंठ से वेदों की गूढ़ स्तुति स्वतः प्रस्फुटित हो उठी:

“योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्॥”

भगवान ने ध्रुव को छत्तीसगढ़ सहस्र (36,000) वर्षों तक पृथ्वी का धर्मपूर्वक राज्य करने का आशीर्वाद दिया, और उसके उपरांत आकाश के उत्तर दिशा में ध्रुव लोक (ध्रुव तारा) प्रदान किया, जिसके चारों ओर सप्तर्षि और समस्त नक्षत्र निरंतर परिक्रमा करते हैं।

६. इस कथा से जीवन का आध्यात्मिक संदेश

  • अपमान को साधना में बदलना: सांसारिक अपमान को यदि क्रोध में बदला जाए तो विनाश होता है, किंतु यदि उसे ईश्वर साधना का संकल्प बना लिया जाए तो अमर पद प्राप्त होता है।
  • सद्गुरु का मार्गदर्शन: नारद रूपी सद्गुरु के बिना सही मंत्र और विधि का ज्ञान संभव नहीं है।
  • बाल्यकाल से संस्कार: धर्म और साधना की कोई निश्चित आयु नहीं होती; निष्कपट हृदय ही परमात्मा को सबसे प्रिय है।
आलेख: पंडित शिवम तिवारी | ज्योतिषाचार्य एवं कर्मकांड विशेषज्ञ
प्रकाशित: PanditDarshan.com — प्रामाणिक सनातन धर्म, वेद एवं पूजा-पाठ का पावन मंच।
शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

इस अनुष्ठान एवं दैनिक साधना हेतु आवश्यक प्रामाणिक सामग्री

कर्मकांडी आचार्यों के परामर्श अनुसार पूजा-पाठ में केवल शुद्ध धातु के पात्र एवं प्रामाणिक धर्मग्रंथों का ही उपयोग करना चाहिए:

★ 4.9 • गीताप्रेस गोरखपुर
श्रीमद्भगवद्गीता (साधक संजीवनी)
स्वामी रामसुखदास जी टीका (₹450)
अमेज़न पर देखें ↗
★ 4.8 • हरिद्वार प्रमाणित
5-मुखी रुद्राक्ष जाप माला
108+1 मनके वैदिक जाप हेतु (₹499)
अमेज़न पर देखें ↗
शुद्ध पीतल पंचमुखी दीपक, हवन पात्र एवं गंगाजल संग्रह देखें। संपूर्ण पूजा सामग्री भंडार देखें →
पंडित दर्शन - सनातन ज्ञान केंद्र

यदि आपको यह विधि या लेख उपयोगी लगा हो, तो अपने परिजनों व मित्रों के साथ साझा करें।

📲 परिजनों को शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *