|| ॐ श्री गणेशाय नमः || सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः || असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ||

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड की गूढ़ चौपाइयां: ‘बंदउँ गुरु पद पदुम परागा’ का आध्यात्मिक रहस्य एवं सत्संग

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
📲 WhatsApp शेयर
॥ श्रीरामचरितमानस दर्शन • बालकाण्ड मंगलाचरण ॥

गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित ‘श्रीरामचरितमानस’ केवल एक पावन ग्रंथ नहीं, अपितु कलियुग में भवसागर पार करने वाली साक्षात ज्ञान-गंगा है। बालकाण्ड के प्रारंभ में जब गोस्वामी जी रामकथा का शुभारंभ करते हैं, तो वे सर्वप्रथम किसी देवी-देवता की स्तुति से पूर्व अपने सद्गुरु के श्रीचरणों की वंदना करते हैं। ‘बंदउँ गुरु पद पदुम परागा’ चौपाई में वेदों और उपनिषदों का जो गूढ़ रस भरा हुआ है, वह हर रामभक्त और साधक के हृदय को आलोकित कर देने वाला है। आइए, इस दिव्य चौपाई के पद-पद का शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक चिंतन करें।

१. मूल चौपाई एवं प्रामाणिक पाठ

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥

२. पद-पद का आध्यात्मिक एवं तात्विक भावार्थ

गोस्वामी जी कहते हैं:

  • ‘बंदउँ गुरु पद पदुम परागा’: मैं सद्गुरु के चरण-कमलों की पराग (धूलि) की वंदना करता हूं। कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी निर्लिप्त रहता है, उसी प्रकार सद्गुरु संसार में रहकर भी माया से अलिप्त रहते हैं।
  • ‘सुरुचि सुबास सरस अनुरागा’: यह चरण-रज सुरुचि (उत्तम रुचि एवं विवेक उत्पन्न करने वाली), सुबास (दिव्य सुगंध से युक्त) और सरस अनुराग (परमात्मा के प्रति रसपूर्ण प्रेम) से परिपूर्ण है।
  • ‘अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥’: यह गुरु चरण-रज अमृत रूपी संजीवनी बूटी का सुंदर चूर्ण है, जो ‘भव-रुज’ अर्थात् जन्म-मरण, काम, क्रोध, मोह, लोभ रूपी संपूर्ण सांसारिक रोगों के परिवार का समूल नाश करने वाला है।

३. गुरु पद नख मनि गन जोती: अंतर्दृष्टि का उद्घाटन

“श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥”

जैसे अंधकार से भरे कक्ष में यदि मणि का प्रकाश हो जाए तो समस्त वस्तुएं स्पष्ट दिखने लगती हैं, उसी प्रकार जब साधक के हृदय में सद्गुरु के चरण-नखों की दिव्य ज्योति का स्मरण होता है, तो हृदय का सारा मोह रूपी अंधकार नष्ट हो जाता है। साधक को ‘दिव्य दृष्टि’ प्राप्त होती है, जिससे उसे सर्वत्र प्रभु श्री सीताराम जी के दर्शन होने लगते हैं।

४. मानस पाठ करते समय साधक को मिलने वाले तीन लाभ

क्रम साधना लाभ आध्यात्मिक प्रभाव
अहंकार का विसर्जन गुरु चरणों की धूलि का स्मरण करते ही ‘मैं कर्ता हूं’ का भ्रम दूर होता है।
विवेक जागृति संसार के नश्वर पदार्थों और अविनाशी परमात्मा के भेद का स्पष्ट ज्ञान।
रामकथा में निष्ठा बिना गुरु कृपा के रामचरितमानस का गूढ़ मर्म कभी हृदयंगम नहीं हो सकता।

५. दैनिक जीवन में इस चौपाई के जप की विधि

प्रातःकाल उठकर स्नान के उपरांत पूजा गृह में दीपक प्रज्वलित कर, पूर्वाभिमुख बैठकर इस चौपाई का ११ या २१ बार पाठ करने से बुद्धि में निर्मलता आती है, विद्या अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति बढ़ती है और घर में सुख-शांति का वास होता है।

आलेख: पंडित शिवम तिवारी | ज्योतिषाचार्य एवं कर्मकांड विशेषज्ञ
प्रकाशित: PanditDarshan.com — प्रामाणिक सनातन धर्म, वेद एवं पूजा-पाठ का पावन मंच।
शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

इस अनुष्ठान एवं दैनिक साधना हेतु आवश्यक प्रामाणिक सामग्री

कर्मकांडी आचार्यों के परामर्श अनुसार पूजा-पाठ में केवल शुद्ध धातु के पात्र एवं प्रामाणिक धर्मग्रंथों का ही उपयोग करना चाहिए:

★ 4.9 • गीताप्रेस गोरखपुर
श्रीमद्भगवद्गीता (साधक संजीवनी)
स्वामी रामसुखदास जी टीका (₹450)
अमेज़न पर देखें ↗
★ 4.8 • हरिद्वार प्रमाणित
5-मुखी रुद्राक्ष जाप माला
108+1 मनके वैदिक जाप हेतु (₹499)
अमेज़न पर देखें ↗
शुद्ध पीतल पंचमुखी दीपक, हवन पात्र एवं गंगाजल संग्रह देखें। संपूर्ण पूजा सामग्री भंडार देखें →
पंडित दर्शन - सनातन ज्ञान केंद्र

यदि आपको यह विधि या लेख उपयोगी लगा हो, तो अपने परिजनों व मित्रों के साथ साझा करें।

📲 परिजनों को शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *