भारतवर्ष की पावन भूमि पर सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों और राजपाट को तिनके के समान त्यागने वाले अनगिनत महापुरुष हुए हैं, किंतु उनमें ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र’ का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। सूर्यवंश के प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट हरिश्चंद्र ने यह सिद्ध कर दिखाया कि चाहे सम्पूर्ण ब्रह्मांड डोल जाए, पर सत्यवादी का धर्म कभी नहीं डोलता। “चंद्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार। पै दृढ़ श्री हरिश्चंद्र को, टरै न सत्य विचार॥” आज के इस पावन चरित्र में हम काशी के मणिकर्णिका घाट पर महर्षि विश्वामित्र द्वारा ली गई परीक्षा और सत्य की अंतिम विजय का दर्शन करेंगे।
१. स्वप्न में साम्राज्य दान और ऋषि विश्वामित्र का आगमन
अयोध्या के महाराज हरिश्चंद्र अपनी दानवीरता और सत्यनिष्ठा के लिए त्रिलोकी में विख्यात थे। एक रात्रि महाराज ने स्वप्न देखा कि वे अपना संपूर्ण राज्य किसी तपस्वी ब्राह्मण को दान कर रहे हैं। प्रातःकाल जब राजदरबार लगा, तो साक्षात महर्षि विश्वामित्र उपस्थित हुए।
राजा ने महर्षि का चरण वंदन किया। विश्वामित्र जी ने कहा—”राजन! तुमने स्वप्न में जो अपना संपूर्ण साम्राज्य मुझे दान किया था, क्या तुम्हें स्मरण है?” राजा हरिश्चंद्र ने बिना एक क्षण के संकोच के उत्तर दिया—”हां भगवन! जो वचन स्वप्न में दिया गया, वह भी सत्य है। यह संपूर्ण पृथ्वी, राजकोष, हाथी, घोड़े और अयोध्यापुरी आज से आपकी हुई।”
२. दक्षिणा की मांग और काशी गमन
विश्वामित्र जी ने कहा—”राज्य तो तुमने दान कर दिया, किंतु बिना दक्षिणा के दान निष्फल होता है। मुझे स्वर्ण मुद्राएं दक्षिणा में दो।” राजा ने राजकोष से मुद्राएं लानी चाहीं, किंतु विश्वामित्र ने रोक दिया—”राजकोष अब मेरा है, मेरे ही धन से मुझे दक्षिणा नहीं दे सकते। अपने श्रम से दक्षिणा चुकाओ।”
दक्षिणा चुकाने हेतु एक मास की अवधि लेकर राजा हरिश्चंद्र अपनी धर्मपत्नी महारानी तारावती और सुकुमार पुत्र रोहिताश्व को लेकर काशी की ओर चल पड़े।
३. काशी में आत्म-समर्पण: रानी, पुत्र और स्वयं का विक्रय
काशी में अवधि समाप्त होने को आई। दक्षिणा की पूर्ति हेतु महाराज ने भारी मन से अपनी प्राणप्रिया रानी तारावती और पुत्र को एक ब्राह्मण के हाथों दासी के रूप में बेच दिया। उससे जो धन मिला, वह अपूर्ण था। तब राजा ने स्वयं को मणिकर्णिका श्मशान के स्वामी चांडाल कल्लू के हाथों बेचकर विश्वामित्र जी की दक्षिणा पूर्ण की।
चक्रवर्ती सम्राट जो कल तक रत्नजड़ित सिंहासनों पर बैठते थे, आज श्मशान के जलते हुए शवों के बीच कर (टैक्स) वसूलने का कार्य करने लगे।
४. परीक्षा की पराकाष्ठा: पुत्र का सर्पदंश एवं कफन का कर
एक दिन बालक रोहिताश्व वाटिका में पूजा हेतु पुष्प चुन रहा था कि एक विषैले सर्प ने उसे डंस लिया। बालक की मृत्यु हो गई। विलाप करती हुई असहाय माता तारावती रात्रि के घनघोर अंधकार में अपने मृत बालक को गोद में उठाकर श्मशान घाट पहुंची।
श्मशान के प्रहरी राजा हरिश्चंद्र ने कहा—”इस श्मशान में दाह संस्कार बिना कर दिए नहीं हो सकता।” तारावती ने रोते हुए कहा—”मैं एक निर्धन दासी हूं, मेरे पास कर देने को फूटी कौड़ी भी नहीं है।” बिजली चमकी, तो राजा ने अपनी पत्नी और अपने मृत पुत्र का मुख पहचाना। पिता का हृदय विदीर्ण हो गया, नेत्रों से अश्रु बहने लगे। किंतु राजा ने कर्तव्य का त्याग नहीं किया:
“प्रिये! मैं चांडाल का सेवक हूं। स्वामी की आज्ञा के विरुद्ध मैं अपने पुत्र के शव का भी दाह संस्कार बिना कर के नहीं होने दे सकता। यदि तुम्हारे पास धन नहीं है, तो अपनी साड़ी का आधा भाग फाड़कर मुझे कर के रूप में दो।”
५. ईश्वरीय साक्षात्कार एवं सत्य की अखंड विजय
जैसे ही तारावती ने अपनी साड़ी फाड़ने का प्रयास किया, संपूर्ण आकाश दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा। साक्षात भगवान श्रीहरि, देवराज इंद्र, धर्मराज और महर्षि विश्वामित्र प्रकट हो गए। पुष्पों की वर्षा होने लगी।
विश्वामित्र जी ने बालक रोहिताश्व को जीवित कर दिया और राजा को गले लगाकर बोले—”राजन! तुम्हारी धर्मनिष्ठा अद्वितीय है। मैंने तुम्हारी परीक्षा ली थी ताकि संसार यह जान सके कि सत्य की महिमा क्या होती है।”
समस्त देवता हाथ जोड़कर बोले—”राजन! जब तक सूर्य, चंद्र और तारे रहेंगे, तब तक तुम्हारा यश अमर रहेगा। जो भी तुम्हारा नाम स्मरण करेगा, उसके पाप कट जाएंगे।” राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार और प्रजा सहित दिव्य विमान से परमधाम को पधारे।
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