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राधा अष्टमी 2026: शुभ मुहूर्त, व्रत नियम, षोडशोपचार पूजा विधि, कथा एवं संपूर्ण आरती

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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॥ श्री राधा कृपा कटाक्ष स्तोत्रम् एवं मंगलाचरण ॥

तप्तकाञ्चनगौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि।
वृषभानुसुते देवि प्रणमामि हरिप्रिये॥

भावार्थ: तपे हुए स्वर्ण के समान उज्ज्वल आभा वाली, श्री वृन्दावन की अधीश्वरी, वृषभानु दुलारी और श्री हरि की परम प्राणप्रिया श्री राधा रानी के युगल चरणों में कोटिशः वंदन है।

सनातन धर्म की वैष्णव परंपरा में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव (श्रीकृष्ण जन्माष्टमी) के ठीक 15 दिन बाद आने वाला यह पावन पर्व ‘राधा अष्टमी’ (Radha Jayanti) के रूप में संपूर्ण ब्रजमंडल, भारतवर्ष और विश्वभर के सनातनी समुदाय में असीम श्रद्धा, कीर्तन और उल्लास के साथ मनाया जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, श्री राधा जी केवल एक साधारण गोपी या प्रेयसी नहीं, अपितु स्वयं परब्रह्म श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति (आनंद प्रदायिनी शक्ति) हैं। बिना राधा रानी के कृपा-कटाक्ष के श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त कर पाना सर्वथा असंभव माना गया है।

🌸 1. राधा अष्टमी 2026: शुभ तिथि एवं मध्याह्न पूजा मुहूर्त

शास्त्रों के अनुसार, श्री राधा रानी का प्राकट्य मध्याह्न काल (दोपहर 12 बजे) में हुआ था। अतः राधा अष्टमी का पूजन विशेष रूप से मध्याह्न काल में ही संपन्न किया जाता है। वर्ष 2026 में राधा अष्टमी का पावन पर्व शनिवार, 19 सितंबर 2026 को अत्यंत शुभ योगों के साथ मनाया जा रहा है।

पंचांग विवरण तिथि एवं समय (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी 2026)
राधा अष्टमी पर्व दिनांक शनिवार, 19 सितंबर 2026
अष्टमी तिथि प्रारंभ शुक्रवार, 18 सितंबर 2026 — दोपहर 01:00 बजे से
अष्टमी तिथि समाप्त शनिवार, 19 सितंबर 2026 — दोपहर 03:26 बजे तक
सर्वोत्तम मध्याह्न पूजा मुहूर्त (Madhyahna Muhurat) सुबह 11:01 AM से दोपहर 01:28 PM तक
(कुल शुभ अवधि: 2 घंटे 27 मिनट)
अमृत काल मुहूर्त सुबह 07:15 AM से सुबह 08:48 AM तक
व्रत पारण समय 19 सितंबर 2026, दोपहर 03:26 बजे के उपरांत अथवा प्रदोष काल में

🌺 2. राधा अष्टमी व्रत का शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक महात्म्य

स्कंद पुराण एवं पद्म पुराण में उल्लेख है कि “जो भक्त कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखता है किंतु राधा अष्टमी का व्रत नहीं करता, उसका जन्माष्टमी व्रत भी पूर्ण फलदायी नहीं होता।” भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि—

“राधा मेरी आत्मा हैं और मैं राधा का प्राण हूँ। जो केवल मेरा स्मरण करता है पर राधा का तिरस्कार करता है, वह मुझे कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। जो ‘राधे-राधे’ बोलता है, मैं उसके पीछे-पीछे बंसी बजाता हुआ चलता हूँ।”
  • अखंड सौभाग्य एवं दांपत्य सुख: सुहागिन स्त्रियों द्वारा यह व्रत करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सौहार्द और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। गृह-कलह सर्वथा शांत हो जाती है।
  • आर्थिक तंगी से मुक्ति: श्री राधा रानी को साक्षात ‘महालक्ष्मी’ का मूल स्वरूप माना जाता है। राधा अष्टमी के दिन राधा-कृष्ण युगल की पूजा करने से घर में अष्टलक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है।
  • मोक्ष व भक्ति की प्राप्ति: पद्म पुराण के अनुसार, राधा अष्टमी का विधिवत व्रत करने वाले साधक को अंतकाल में गोलोक धाम की प्राप्ति होती है और समस्त संचित पाप भस्म हो जाते हैं।

📋 3. राधा अष्टमी संपूर्ण पूजन सामग्री सूची (Puja Samagri Checklist)

पूजन से पूर्व प्रातःकाल ही निम्नलिखित दिव्य एवं शुद्ध सामग्रियों की व्यवस्था कर लें ताकि मध्याह्न मुहूर्त में बिना किसी विघ्न के अनुष्ठान संपन्न हो सके:

वर्ग आवश्यक सामग्रियां
विग्रह व वस्त्र श्री राधा-कृष्ण की धातु (अष्टधातु/पीतल) की प्रतिमा अथवा युगल चित्र, राधा जी के लिए पीली/लाल चुनरी व लहंगा, कान्हा जी के लिए पीतांबर, मोरपंख, बांसुरी, मुकुट, कुंडल, मोतियों की माला।
अभिषेक सामग्री गाय का कच्चा दूध, ताजा दही, देसी घी, शुद्ध शहद, बूरा/मिश्री, गंगाजल, गुलाब जल एवं इत्र।
शृंगार व पूजन द्रव्य रोली, कुमकुम, गोपीचंदन, अक्षत (अखंडित चावल), अष्टगंध, सिन्दूर, मेहंदी, आलता, लाल चूड़ियां, बिंदी, काजल, इत्र की शीशी।
पुष्प व पत्ते गुलाब, गेंदा, कमल का फूल, वैजयंती माला, दूर्वा, पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची। (विशेष ध्यान: तुलसी दल केवल भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करें, राधा रानी के सीधे विग्रह पर तुलसी न चढ़ाएं)।
विशेष भोग व नैवेद्य माखन-मिश्री, मालपुआ, पंचमेवा, मौसमी फल (केला, सेब, अनार), सिंघाड़े का हलवा, अरबी की सात्विक सब्जी (राधा अष्टमी पर अरबी का भोग अत्यंत प्रिय है) तथा मीठा पान।

🪔 4. षोडशोपचार पूजा विधि: चरण-दर-चरण संपूर्ण विधान

चरण 1: प्रातः स्नान, संकल्प एवं वेदी निर्माण

राधा अष्टमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिश्रित जल से स्नान करें। स्वच्छ नवीन अथवा धुले हुए पीले वस्त्र धारण करें। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) अथवा पूजा घर में एक सुंदर लकड़ी की चौकी रखें। चौकी पर लाल अथवा पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। उस पर अक्षत की अष्टदल कमल की आकृति बनाएं और तांबे या पीतल का कलश स्थापित करें। कलश में जल, सुपारी, सिक्का और आम के पल्लव रखकर उस पर नारियल स्थापित करें।

संकल्प मंत्र: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर कहें —
“मम सर्वपापक्षयपूर्वकं श्रीराधा-कृष्ण प्रीतिपूर्वकं च इह जन्मनि परजन्मनि च अखंड सौभाग्य-पुत्र-पौत्र-धन-धान्य वृद्धये श्रीराधाष्टमी व्रतमहं करिष्ये।”

चरण 2: युगल विग्रह स्थापना एवं पंचामृत अभिषेक

चौकी पर भगवान श्रीकृष्ण के बायीं ओर श्री राधा रानी की प्रतिमा या युगल चित्र स्थापित करें। यदि आपके पास धातु के विग्रह हैं, तो उन्हें किसी तांबे या चांदी की थाली में पधराएं। सबसे पहले गंगाजल से, फिर क्रमशः गाय के दूध, दही, घी, शहद और शर्करा (पंचामृत) से अभिषेक करें। अभिषेक के समय “ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः” का निरंतर जप करते रहें। अंत में शुद्ध जल एवं गुलाब जल से स्नान कराकर मुलायम वस्त्र से पोंछें।

चरण 3: दिव्य शृंगार एवं सोलह शृंगार अर्पण

श्री राधा रानी को सुंदर लहंगा, चुनरी और कंचुकी पहनाएं। ठाकुर जी को पीतांबर धारण कराएं। राधा रानी के विग्रह पर चंदन और कुमकुम से तिलक करें। उन्हें मांगटीका, नथ, झुमके, चूड़ियां, पाजेब, कंगन और कमरबंद अर्पित करें। चरणों में आलता लगाएं। सुहागिन महिलाएं अपनी ओर से सोलह शृंगार की पिटारी राधा जी के चरणों में समर्पित करें।

चरण 4: गंध, अक्षत, धूप-दीप एवं पुष्प अर्पण

राधा रानी को सुगंधित अष्टगंध, इत्र (विशेषकर गुलाब या चमेली) अर्पित करें। सुगंधित धूपबत्ती और गाय के शुद्ध घी का पंचमुखी दीपक प्रज्वलित करें। नीलकमल, लाल गुलाब और गेंदे के ताजे फूलों की सुंदर माला पहनाएं।

चरण 5: प्रिय भोग व नैवेद्य समर्पण

मध्याह्न काल (11:01 AM से 01:28 PM) में श्री राधा रानी और कान्हा जी को माखन-मिश्री, मालपुआ, रबड़ी, ऋतुफल और अरबी की सब्जी (कच्चू) का भोग लगाएं। याद रखें, भगवान श्रीकृष्ण के भोग में तुलसी पत्र अवश्य रखें, किंतु राधा रानी के पात्र में तुलसी पत्र नहीं रखा जाता। भोग अर्पण के उपरांत सुगंधित मीठा पान (लौंग-इलायची युक्त) समर्पित करें।

चरण 6: राधा नाम मंत्र जप

तुलसी की माला अथवा कमल गट्टे की माला से कम से कम 11 या 21 माला निम्नलिखित सिद्ध मंत्रों का जप करें:

  • राधा गायत्री मंत्र: “ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात्॥”
  • द्वादशाक्षर मंत्र: “ॐ ह्रीं राधिकायै नमः स्वाहा॥”
  • महामंत्र: “राधे राधे गोविन्द, गोविन्द राधे। श्री राधे राधे गोविन्द, गोविन्द राधे॥”

📖 5. राधा अष्टमी की पावन पौराणिक व्रत कथा

पद्म पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, द्वापर युग में ब्रज के राजा वृषभानु और उनकी धर्मपत्नी महारानी कीर्ति ने पूर्व जन्म में भगवान नारायण से एक दिव्य कन्या को पुत्री रूप में पाने हेतु सहस्रों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि द्वापर युग में स्वयं आदिशक्ति महालक्ष्मी उनकी पुत्री के रूप में अवतरित होंगी।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दोपहर के समय, राजा वृषभानु जब रावल गांव के निकट यमुना तट पर स्नान कर रहे थे, तभी उन्होंने देखा कि यमुना जी के मध्य एक सहस्र दल (हजार पंखुड़ियों वाला) स्वर्णिम कमल पुष्प प्रस्फुटित हो रहा है। उस दिव्य कमल पुष्प की कर्णिका पर एक अलौकिक, सूर्य सदृश देदीप्यमान नन्हीं बालिका लेटी हुई मुस्कुरा रही थी। राजा वृषभानु अत्यंत विस्मित और भावविभोर होकर उस कन्या को अपनी गोद में उठाकर अपने महल ले आए।

आंखें न खोलने का अलौकिक रहस्य: बालिका रूपी श्री राधा रानी ने अपने जन्म के उपरांत कई महीनों तक अपनी आंखें नहीं खोलीं। राजा वृषभानु और माता कीर्ति अत्यंत दुखी हुए कि उनकी पुत्री दृष्टिहीन है। जब गोकुल में नंद बाबा और यशोदा मैया अपने नन्हे कन्हैया (श्रीकृष्ण) को लेकर वृषभानु जी के महल बधाई देने आए, तब जैसे ही बाल कृष्ण घुटनों के बल चलते हुए झूले के निकट पहुंचे और राधा जी के मुखकमल का स्पर्श किया, उसी क्षण श्री राधा रानी ने अपनी दिव्य आंखें खोल दीं! श्री राधा जी ने संसार में सबसे पहले किसी अन्य वस्तु या व्यक्ति को न देखकर केवल अपने आराध्य परब्रह्म श्रीकृष्ण के ही दर्शन किए। यह देखकर दोनों परिवार परमानंद में डूब गए और बरसाने में शंख, भेरी और मृदंग गूंज उठे।

🔔 6. श्री राधा रानी की पावन आरती (Complete Aarti)

पूजन के अंत में कपूर और गाय के शुद्ध घी के दीप से आरती करें। आरती करते समय तीन बार घंटी और शंखनाद अवश्य करें।

॥ श्री राधा जी की आरती (आरती श्री वृषभानुसुता की) ॥

आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की॥
त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनी, विमल विवेकविराग विकासिनी।
पावन प्रभु पद प्रीति कारिणी, सुंदर प्रभा प्रेम रस धारा की॥
आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की॥

गौर मुख सोभा अमित अपारा, नवल किसोरी रूप निहारा।
बंसुरी अधर सुधारस घोरी, जन मन हरनि कृपा सुखकारा की॥
आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की॥

राधा नाम परम सुखदाई, भजतहिं सकल अमंगल जाई।
कृष्ण प्राण वल्लभा सुहासिनी, जय जय जय सुखधाम उदार की॥
आरती श्री वृषभानुसुता की, मंजुल मूर्ति मोहन ममता की॥

॥ युगल आरती: ॐ जय श्री राधा जय श्री कृष्णा ॥

ॐ जय श्री राधा, जय श्री कृष्णा, श्री राधा कृष्णाय नमः।
घूम घुमारो घामर सोहे, कान्हा बंसी बजाए नमः॥
ॐ जय श्री राधा, जय श्री कृष्णा…॥

राधा राधा नाम रटत ही, सब व्याधि मिट जाए।
कोटि जनम के पाप कटत हैं, सहज परम पद पाए॥
ॐ जय श्री राधा, जय श्री कृष्णा…॥

पीताम्बर सोहे मोहन को, चुनरी सोहे राधा प्यारी।
मुकुट विराजे नटवर नागर, रूप छबी अति न्यारी॥
ॐ जय श्री राधा, जय श्री कृष्णा…॥

प्रेम सहित जो आरती गावे, राधा-माधव कृपा पावे।
मनवांछित फल पाकर प्राणी, भवसागर तर जावे॥
ॐ जय श्री राधा, जय श्री कृष्णा…॥

⚠️ 7. राधा अष्टमी व्रत के नियम, सावधानियां और क्या न करें

✅ क्या करें (Do’s)

  • मध्याह्न 12 बजे राधा रानी की प्राकट्य आरती अवश्य करें।
  • पीले अथवा लाल रंग के स्वच्छ, पवित्र वस्त्र धारण करें।
  • राधा जी को अरबी की सात्विक सब्जी, मालपुआ और मिश्री का भोग लगाएं।
  • दिनभर मन में ‘राधे-राधे’ नाम का मानसिक संकीर्तन करते रहें।
  • गौमाता को हरा चारा व गुड़ खिलाएं और ब्राह्मणों को दान दें।

❌ क्या न करें (Don’ts)

  • राधा रानी के विग्रह पर सीधे तुलसी दल न चढ़ाएं।
  • व्रत के दिन घर में लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा आदि तामसिक भोजन न बनाएं।
  • किसी भी स्त्री या कन्या का अपमान अथवा कटु वचन न बोलें।
  • बिना मध्याह्न पूजा व कथा श्रवण के व्रत का पारण न करें।
  • काले या नीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजन न करें।

पं
आचार्य एवं कर्मकांडी ब्राह्मण: पंडित शिवम तिवारी

ज्योतिष, कर्मकांड एवं वैदिक अनुष्ठान विशेषज्ञ | संस्थापक: PanditDarshan.com
“श्री वृषभानु नन्दिनी आप सभी साधकों के जीवन में अखंड सौभाग्य, सुख-शांति एवं अनन्य भक्ति की वर्षा करें। बोलिए श्री राधे रानी की जय!”

शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

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