राजा हरिश्चंद्र की कथा
“सत्यमेव जयते” की भावना को अगर किसी एक कथा से समझना हो, तो वह राजा हरिश्चंद्र की कथा है। यह कहानी बताती है कि सत्य पर अडिग रहना कितना कठिन हो सकता है, और फिर भी सच्चाई का मार्ग क्यों सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। यह कथा पीढ़ियों से भारतीय परिवारों में सत्यनिष्ठा की सबसे बड़ी मिसाल के रूप में सुनाई जाती रही है।
सत्यव्रती राजा
अयोध्या के राजा हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। उन्होंने प्रण लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे कभी असत्य नहीं बोलेंगे। एक दिन स्वर्ग में देवताओं की सभा में यह चर्चा हुई कि क्या वाकई कोई मनुष्य ऐसा हो सकता है जो हर परिस्थिति में सत्य पर अडिग रहे। ऋषि वशिष्ठ ने राजा हरिश्चंद्र का नाम लिया, पर ऋषि विश्वामित्र को इस पर संदेह था। उन्होंने राजा की परीक्षा लेने का निश्चय किया।
सपने में राज्य का दान
विश्वामित्र ऋषि ने पहले एक स्वप्न के माध्यम से राजा से उनका पूरा राज्य दान में मांग लिया, और राजा ने सोते हुए भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपना संपूर्ण राज्य दान कर दिया। जागने पर जब उन्हें पता चला कि यह वादा वास्तव में निभाना है, तो उन्होंने अपने वचन से पीछे हटने के बजाय सचमुच अपना पूरा राजपाट, धन-संपत्ति, सब कुछ विश्वामित्र को दान में दे दिया।
दक्षिणा के लिए काशी में विक्रय
राज्य दान करने के बाद भी विश्वामित्र ने दक्षिणा की मांग की। राजा हरिश्चंद्र के पास अब कुछ भी शेष नहीं था, इसलिए वे अपनी पत्नी रानी तारामती और पुत्र रोहिताश्व के साथ काशी चले गए, यह सोचकर कि वहां कुछ काम करके दक्षिणा का प्रबंध करेंगे। पर समय सीमा पूरी होने पर भी दक्षिणा नहीं जुट पाई, तो राजा ने स्वयं को एक चांडाल (श्मशान के रखवाले) के हाथों बेच दिया, और अपनी पत्नी और पुत्र को भी एक ब्राह्मण के यहां दासी के रूप में बेचना पड़ा, ताकि दक्षिणा चुकाई जा सके।
श्मशान में कठिन परीक्षा
राजा हरिश्चंद्र अब श्मशान में शव जलाने का कर देने वाला, एक चांडाल के अधीन सेवक बन गए। इसी दौरान एक दुखद घटना हुई, उनके अपने पुत्र रोहिताश्व की सांप के काटने से मृत्यु हो गई। जब शोकाकुल रानी तारामती पुत्र का दाह संस्कार करने श्मशान पहुंचीं, तो नियमानुसार राजा हरिश्चंद्र ने अपने ही पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए भी शुल्क मांगा, क्योंकि यह उनका कर्तव्य था, और उनके पास देने के लिए कुछ नहीं बचा था।
यह दृश्य हृदयविदारक था, एक पिता जो अपने बेटे की मृत्यु पर शोक भी नहीं मना सकता, क्योंकि उसे अपने वचन और कर्तव्य का पालन करना था। इस अत्यंत कठिन परिस्थिति में भी राजा हरिश्चंद्र ने न झूठ का सहारा लिया, न अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ा।
देवताओं का प्रकट होना
इस चरम परीक्षा के क्षण में स्वयं भगवान (धर्मराज सहित अन्य देवता) प्रकट हुए। ऋषि विश्वामित्र भी वहां आए और राजा की अटूट सत्यनिष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा की परीक्षा का सत्य बताया, और उनके पुत्र रोहिताश्व को पुनर्जीवित कर दिया। राजा हरिश्चंद्र का खोया हुआ राज्य, धन-संपत्ति, और परिवार, सब कुछ वापस मिल गया, और उन्हें आशीर्वाद मिला कि उनकी कथा युगों-युगों तक सत्य की मिसाल के रूप में याद की जाएगी।
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