श्री शिव चालीसा
जैसे हनुमान चालीसा संकट में साहस देती है, वैसे ही शिव चालीसा मन को शांति देती है। सोमवार के दिन या महाशिवरात्रि पर बहुत से घरों में इसका पाठ होता है। इसमें भगवान शिव के रूप, उनकी महिमा और उनकी कृपा का वर्णन है।
दोहा
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देउ अभय वरदान॥
जय गिरिजा पति दीन हित, करुणा सिंधु महेश।
करत बिनय शिव उमापति, मेटहु मन के क्लेश॥
चालीसा
जय गिरिजा पति दीनदयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नंदि गणेश सोहैं तहं कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तबहिं दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लव निमेष महं मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
कियउ तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तुम्हारी। महादेव सब जगत खरारी॥
त्रिपुरासुर वध कीन्हा तत्काला। महादेव जी सदा कृपाला॥
कब हम पावें दर्शन तेरा। सुनिय दास की विनय अनेरा॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावनहारी॥
पुत्र हीन इच्छा कर कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पंडित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानी सकल दुःख हरहु हमारी॥
समापन दोहा
नित्त नेम उठि प्रातःही, पाठ करौ चालीस।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
भाव और महत्व
शिव चालीसा में भगवान शिव के रूप, उनकी कृपा और उनके द्वारा किए गए विभिन्न कल्याणकारी कार्यों का वर्णन है, जैसे त्रिपुरासुर वध और जलंधर असुर का संहार। इसे नियमित रूप से पढ़ने से मन की शांति, संकटों से मुक्ति और मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता है।
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