प्रह्लाद की कथा
यह कथा सिर्फ एक बालक की नहीं, बल्कि इस सच्चाई की है कि सच्ची भक्ति के आगे कोई ताकत टिक नहीं सकती, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो। प्रह्लाद की कहानी हमें बताती है कि भक्ति उम्र नहीं देखती, और भगवान अपने भक्त की रक्षा के लिए किसी भी रूप में आ सकते हैं।
एक असुर के घर जन्म
हिरण्यकशिपु एक अत्यंत शक्तिशाली असुर राजा था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त किया था कि न कोई मनुष्य उसे मार सके, न कोई पशु, न दिन में न रात में, न घर के भीतर न बाहर, न धरती पर न आकाश में, न किसी अस्त्र से न किसी शस्त्र से। इस वरदान के बाद वह खुद को अजेय समझने लगा और अहंकार में डूब गया। उसने आदेश दे दिया कि पूरे राज्य में केवल उसी की पूजा हो, किसी देवता की नहीं।
ऐसे ही अहंकारी पिता के घर, प्रह्लाद का जन्म हुआ। पर आश्चर्य की बात यह थी कि बचपन से ही प्रह्लाद का मन भगवान विष्णु की भक्ति में रमा रहता था। जब भी मौका मिलता, वह भगवान का नाम जपता, उनकी स्तुति करता। यह देखकर हिरण्यकशिपु को गहरा आघात लगा, उसका अपना पुत्र उसी भगवान का भक्त था, जिसे वह अपना शत्रु मानता था।
पिता के प्रयास, पुत्र को रोकने के
हिरण्यकशिपु ने पहले प्रह्लाद को समझाने की कोशिश की, प्रलोभन दिए, डराया-धमकाया। पर प्रह्लाद का उत्तर हमेशा एक ही होता, वह कहता कि भगवान विष्णु ही सबके रक्षक हैं, और वे हर जगह, हर वस्तु में विद्यमान हैं। यह सुनकर हिरण्यकशिपु का क्रोध बढ़ता गया, और उसने अपने ही पुत्र को मार डालने का निश्चय कर लिया।
उसने कई बार प्रह्लाद को मारने का प्रयत्न किया। कभी उसे विषैला भोजन दिया गया, पर प्रह्लाद पर उसका कोई असर नहीं हुआ। कभी उसे पहाड़ की चोटी से नीचे फेंकवाया गया, पर वह सुरक्षित बच गया। कभी उसे मतवाले हाथियों के सामने डाल दिया गया, पर हाथियों ने भी उसे कोई हानि नहीं पहुंचाई। कभी सांपों से भरे कक्ष में बंद किया गया, पर सांप उसके पास आकर भी शांत रहे। हर बार भगवान विष्णु ने किसी न किसी रूप में प्रह्लाद की रक्षा की, और हर बार प्रह्लाद की भक्ति और दृढ़ हो गई।
होलिका और अग्नि की परीक्षा
अंत में हिरण्यकशिपु की बहन होलिका सामने आई। उसे यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती। उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती हुई चिता में बैठने का निश्चय किया, यह सोचकर कि वह स्वयं बच जाएगी और प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएगा। पर जब अग्नि प्रज्वलित हुई, तो हुआ इसका बिल्कुल उल्टा। होलिका का वरदान तभी काम करता था जब वह उसका दुरुपयोग न करे, और इस पाप कार्य के लिए उसका वरदान निष्फल हो गया। होलिका जलकर भस्म हो गई, और प्रह्लाद भगवान के नाम का जाप करते हुए बिना किसी हानि के अग्नि से बाहर निकल आया। आज भी हर साल इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है, बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक स्वरूप।
स्तंभ से प्रकट हुए नरसिंह भगवान
प्रह्लाद के बार-बार बच जाने से हिरण्यकशिपु का क्रोध अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया। एक दिन उसने क्रोध में पूछा, तेरा भगवान कहां है, क्या वह इस खंभे में भी है? प्रह्लाद ने शांति से उत्तर दिया, हां पिताजी, भगवान हर जगह हैं, इस खंभे में भी। यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर उसी खंभे पर प्रहार किया।
और तभी वह खंभा फट गया, और उसमें से भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार में प्रकट होकर हिरण्यकशिपु को उसके अहंकार का फल दिया। नरसिंह भगवान का रूप न पूर्ण मनुष्य था, न पूर्ण पशु, यानी हिरण्यकशिपु के वरदान के अनुसार न मनुष्य, न पशु। उन्होंने हिरण्यकशिपु को द्वार की देहरी पर रखा, जो न घर के भीतर था, न बाहर। समय संध्या का था, जो न दिन था, न रात। उन्होंने अपने नाखूनों से उसका वध किया, जो न कोई शस्त्र थे, न अस्त्र। इस प्रकार हिरण्यकशिपु का वह वरदान भी उसे बचा नहीं सका, जिस पर उसे इतना घमंड था।
भक्त की रक्षा
नरसिंह भगवान के अत्यंत क्रोधित रूप को देखकर सभी देवता भी भयभीत हो गए। तब प्रह्लाद निडर होकर आगे आया और भगवान की स्तुति करने लगा। उसकी भक्ति और निष्कपट भाव को देखकर भगवान नरसिंह शांत हुए, और उन्होंने प्रह्लाद को गोद में उठाकर आशीर्वाद दिया। प्रह्लाद को बाद में राज्य भी प्राप्त हुआ, और उसने धर्म के मार्ग पर चलकर एक आदर्श राजा के रूप में शासन किया।
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