|| ॐ श्री गणेशाय नमः || सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः || असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ||

रामचरितमानस | बालकाण्ड, भाग 1

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 1

बालकाण्ड, भाग 1, मंगलाचरण एवं वंदना

ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित

रामचरितमानस के प्रथम सोपान, बालकाण्ड की शुरुआत गोस्वामी तुलसीदास जी सरस्वती, गणेश, शिव-पार्वती, गुरु और स्वयं श्रीराम की वंदना से करते हैं। यह भाग उन्हीं शुरुआती श्लोकों, चौपाइयों और दोहों को उनके मूल रूप में एवं सरल हिंदी अर्थ सहित प्रस्तुत करता है।

श्लोक 1, सरस्वती-गणेश वंदना

श्लोक १
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
अक्षरों, अर्थों के समूहों, रसों, छन्दों और सभी मंगल कार्यों को सिद्ध करने वाली माता सरस्वती और भगवान गणेश, दोनों की मैं वंदना करता हूं।

श्लोक 2, गौरी-शंकर वंदना

श्लोक २
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥
श्रद्धा और विश्वास के साक्षात रूप माता पार्वती और भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूं, जिनकी कृपा के बिना सिद्ध पुरुष भी अपने भीतर बसे ईश्वर को नहीं देख पाते।

श्लोक 3, गुरु वंदना

श्लोक ३
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्करूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥
मैं उस नित्य, ज्ञानस्वरूप गुरु को वंदना करता हूं जो साक्षात शिव रूप हैं, जिनका सहारा पाकर टेढ़ा चंद्रमा भी सब जगह पूजनीय बन जाता है।

श्लोक 4, वाल्मीकि-हनुमान वंदना

श्लोक ४
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ। वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥
सीता-राम के गुणों रूपी पवित्र वन में सदा विचरण करने वाले, शुद्ध ज्ञान से संपन्न कविश्रेष्ठ वाल्मीकि जी और कपिश्रेष्ठ हनुमान जी को मैं वंदना करता हूं।

श्लोक 5, सीता माता वंदना

श्लोक ५
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥
सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करने वाली, समस्त कष्टों को हरने वाली, सबका कल्याण करने वाली श्रीराम की प्रिय सीता माता को मैं प्रणाम करता हूं।

श्लोक 6, श्रीराम वंदना

श्लोक ६
यन्मायावशवर्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षवतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥
जिनकी माया के वश में यह पूरा विश्व है, ब्रह्मा आदि देवता और असुर भी हैं, जिनके अस्तित्व मात्र से यह संसार सत्य जैसा प्रतीत होता है (जैसे रस्सी में सांप का भ्रम होता है), और जिनके चरण ही संसार-सागर से पार जाने की एकमात्र नौका हैं, उन सबके परम कारण भगवान राम को मैं वंदना करता हूं।

श्लोक 7, ग्रंथ रचना का उद्देश्य

श्लोक ७
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि। स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा- भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥
अनेक पुराणों, वेदों और शास्त्रों में जो कहा गया है, तथा रामायण में जो वर्णित है, और कुछ अन्य स्रोतों से भी प्राप्त हुआ है, उसी श्रीरघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने मन की प्रसन्नता के लिए सरल भाषा में अत्यंत सुंदर ढंग से रच रहे हैं।

सोरठा, संत समाज का महत्व

सोरठा १
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
जिनका स्मरण करते ही सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं, हाथी के समान मुखवाले जो गणों के स्वामी हैं, बुद्धि की राशि और शुभ गुणों के धाम गणेश जी मुझ पर कृपा करें।
सोरठा २
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन। जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥
जिनकी कृपा से गूंगा भी सुंदर वक्ता बन जाता है और लंगड़ा भी दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाता है, कलियुग के सभी पापों को जलाने वाले वे दयालु भगवान मुझ पर प्रसन्न हों।

चौपाई, गुरु वंदना का विस्तार

चौपाई
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥
मैं अपने गुरु महाराज के चरण-कमलों की वंदना करता हूं, जो कृपा के सागर और नररूप में साक्षात हरि ही हैं, जिनके वचन महामोह रूपी घने अंधकार को नाश करने के लिए सूर्य की किरणों के समान हैं।
चौपाई
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
मैं गुरु महाराज के चरण-कमलों की धूल की वंदना करता हूं, जो सुंदर रुचि, सुगंध और रस से भरी है, और जो संसार के सभी रोगों को शांत करने वाला अमृत जैसा सुंदर चूर्ण है।
चौपाई
सुकृति सभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती॥ जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी॥
वह रज (गुरु चरण की धूल) पुण्यरूपी शरीर पर सुशोभित होने वाली पवित्र विभूति है, सुंदर मंगल और आनंद को जन्म देने वाली है। यह भक्तों के मनरूपी सुंदर दर्पण का मैल दूर करने वाली है, और तिलक करने से गुणों के समूह को वश में करने वाली है।
चौपाई
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती॥ दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
श्रीगुरु महाराज के चरणों के नखों की ज्योति मणियों के समूह के समान है, जिसका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है। वह प्रकाश मोहरूपी अंधकार को नाश करने वाला है, और बड़े भाग्य से ही किसी के हृदय में आता है।

दोहा, रामचरित्र वर्णन का संकल्प

दोहा
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥
जैसे सिद्ध अंजन (काजल) को आंखों में लगाकर साधक, सिद्ध और सुजान लोग पर्वतों, वनों और पृथ्वी के भीतर छिपे अनेक खज़ानों को कौतुक से देख लेते हैं।
चौपाई
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥ तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥
गुरु महाराज के चरणों की धूल कोमल और सुंदर अंजन है, यह नेत्रों के अमृत के समान है जो दृष्टि दोषों का नाश करने वाला है। उसी अंजन से विवेकरूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार-बंधन से मुक्ति देने वाले श्रीरामचरित्र का वर्णन करता हूं।
चौपाई
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥ सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥
मैं सबसे पहले ब्राह्मणों के चरणों की वंदना करता हूं, जो मोहवश उत्पन्न सभी संदेहों को हरने वाले हैं। फिर सभी गुणों की खान सज्जन समाज को प्रेमपूर्वक सुंदर वाणी से प्रणाम करता हूं।
चौपाई
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा॥
संतों का चरित्र कपास के पौधे के समान शुभ है, जिसका फल स्वयं तो नीरस (स्वार्थरहित) पर गुणों से भरपूर होता है। जो स्वयं दुख सहकर भी दूसरों के दोष ढकता है, वही संसार में यश पाकर वंदनीय बनता है।
यह भाग पृष्ठ १ से ५ (मूल पुस्तक) तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 2 में गुरु वंदना का शेष भाग एवं देवता वंदना
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