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रामचरितमानस | बालकाण्ड, भाग 2

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 2

बालकाण्ड, भाग 2, सत्संग महिमा एवं खल वंदना

ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित

भाग 1 में हमने मंगलाचरण और गुरु वंदना पढ़ी। इस भाग में तुलसीदास जी सत्संग (संतों की संगति) की महिमा बताते हैं, और फिर एक अत्यंत रोचक भाग आता है, खल वंदना, जिसमें दुष्टों की भी बड़ी चतुराई और व्यंग्यपूर्ण ढंग से “वंदना” की गई है।

सत्संग की महिमा

चौपाई
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥ राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥
संतों का समाज आनंद और कल्याण से भरपूर है, जो मानो चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) ही है। जहां राम-भक्तिरूपी गंगा की धारा है और ब्रह्म-विचाररूपी सरस्वती बहती है।
चौपाई
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥
सत्संग के बिना विवेक नहीं होता, और वह सत्संग श्रीराम की कृपा के बिना सहज नहीं मिलता। सत्संग ही आनंद और कल्याण की जड़ है, वही फल और सिद्धि है, बाकी सब साधन तो केवल फूल हैं।
चौपाई
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥ जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
वाल्मीकि जी, नारद जी और अगस्त्य जी ने अपने-अपने मुख से अपनी जीवन-कथा कही है। जल में रहने वाले, धरती पर चलने वाले और आकाश में विचरने वाले, संसार के सभी जड़-चेतन जीव इसके साक्षी हैं।
चौपाई
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहि पाई॥ सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥
बुद्धि, कीर्ति, गति, समृद्धि और भलाई, जिसने जब जिस प्रयास से जहां भी पाई है, वह सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिए। इसे पाने का लोक और वेद में और कोई उपाय नहीं है।
चौपाई
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥
मूर्ख भी सत्संग पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा भी सुंदर सोना बन जाता है। पर यदि दैवयोग से सज्जन कभी कुसंगति में पड़ जाएं, तो वे सांप की मणि के समान अपने ही गुण का अनुसरण करते रहते हैं (यानी अपनी अच्छाई नहीं छोड़ते)।
दोहा
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥
मैं संतों को प्रणाम करता हूं, जिनका चित्त सबके प्रति समान रहता है, जिनका न कोई शत्रु है न मित्र, जैसे अंजलि में रखे सुंदर फूल दोनों हाथों को समान रूप से सुगंधित करते हैं।

खल वंदना, दुष्टों की व्यंग्यपूर्ण वंदना

अब तुलसीदास जी एक अत्यंत रोचक शैली अपनाते हैं। वे खल (दुष्ट) लोगों की भी “वंदना” करते हैं, पर हर पंक्ति में ऐसी चतुराई से तुलना करते हैं कि प्रशंसा और निंदा दोनों एक साथ प्रकट होती हैं।

चौपाई
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥ पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरैं हरष बिषाद बसेरें॥
अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को भी प्रणाम करता हूं, जो बिना किसी प्रयोजन के भी अपने हितकारी के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों की हानि ही जिनको लाभ लगती है, जिनको दूसरों के उजड़ने पर हर्ष और बसने पर विषाद होता है।
चौपाई
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥ जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
जो हरि और शिव के यशरूपी पूर्णिमा के चंद्रमा के लिए राहु के समान हैं, जो दूसरों की बुराई करने में सहस्रबाहु के समान वीर हैं। जो दूसरों के दोष हज़ार आंखों से देखते हैं, और दूसरों के हित रूपी घी में जिनका मन मक्खी के समान है (जो भलाई को भी बिगाड़ देता है)।
चौपाई
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥ उदय केत सम हित सब ही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
जो तेज में अग्नि के समान और क्रोध में यमराज के समान हैं, जो पाप और अवगुणरूपी धन के कुबेर के समान धनी हैं। जो सबके हित के नाश के लिए केतु (पुच्छल तारे) के समान हैं, और जो कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई मानते हैं।
चौपाई
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥ बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
जो दूसरों को हानि पहुंचाने के लिए अपना शरीर तक त्याग देते हैं, जैसे ओले खेती को नष्ट करके स्वयं भी गल जाते हैं। मैं दुष्टों को शेषनाग के समान प्रणाम करता हूं, जो क्रोध में हज़ार मुखों से दूसरों के दोषों का वर्णन करते हैं।
दोहा
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति। जानि पानि जुग जोरि जन बिनति करइ सप्रीति॥
उदासीन, शत्रु या मित्र, किसी का भी हित सुनकर दुष्टों का स्वभाव जल उठना है, यह जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रेमपूर्वक उनसे विनती करता हूं।
चौपाई
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
अब मैं संत और दुष्ट, दोनों के चरणों की वंदना करता हूं, दोनों ही दुख देने वाले हैं, पर उनमें कुछ अंतर है। एक (संत) बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं (यानी उनका वियोग असहनीय होता है), और दूसरे (दुष्ट) मिलते ही भयंकर दुख देते हैं।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ ५ से ८ तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 3 में संत-असंत तुलना का शेष भाग
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