🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 3
बालकाण्ड, भाग 3, गुण-दोष विवेक एवं सर्वव्यापी वंदना
ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित
भाग 2 में हमने संत-असंत की तुलना पढ़ी। इस भाग में तुलसीदास जी इस विषय को और गहराई से समझाते हैं, कैसे संसार में गुण और दोष दोनों साथ-साथ रहते हैं, और विवेकी पुरुष कैसे उनमें भेद करता है। यह भाग उस प्रसिद्ध हंस-नीर-क्षीर विवेक और अंत में सम्पूर्ण सृष्टि को राममय जानकर की गई वंदना पर समाप्त होता है।
गुण-दोष का स्वाभाविक विवेक
चौपाई
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥
भले और बुरे लोग अपने-अपने कर्मों के अनुसार सुंदर यश या अपयश की संपत्ति पाते हैं। अमृत, चंद्रमा, गंगाजी और साधु पुरुष (शुभ के उदाहरण हैं), वहीं विष, अग्नि, कलियुग के पाप और रोग (अशुभ के उदाहरण हैं)।
दोहा
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥
भला व्यक्ति भलाई का ही फल पाता है और नीच व्यक्ति नीचता का। अमृत की प्रशंसा उसकी अमरता देने की शक्ति के लिए होती है, और विष की चर्चा उसके मार डालने के गुण के कारण होती है।
चौपाई
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥
भले और बुरे, दोनों को विधाता ने ही उत्पन्न किया है, पर वेदों ने उनके गुण-दोष को अलग-अलग करके बताया है। वेद, इतिहास और पुराण सभी कहते हैं कि विधाता की यह सृष्टि गुण-अवगुण दोनों से मिलकर बनी है।
हंस-नीर-क्षीर विवेक
दोहा
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥
विधाता ने इस जड़-चेतन विश्व को गुण-दोष दोनों से मिश्रित रचा है, परंतु संतरूपी हंस दोषरूपी जल को छोड़कर गुणरूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं।
चौपाई
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥
काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥
जब विधाता ऐसा विवेक देते हैं, तब मन दोषों को छोड़कर गुणों में ही अनुरक्त होता है। पर काल, स्वभाव और कर्म की प्रबलता से कभी-कभी भले लोग भी प्रकृति के वशीभूत होकर भलाई से चूक जाते हैं।
चौपाई
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥
भगवान के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं, दुख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं। दुष्ट भी कभी-कभी अच्छा संग पाकर भलाई करते हैं, पर उनका मलिन स्वभाव पूरी तरह नहीं मिटता।
चौपाई
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
जो छली हैं, वे भी अच्छा वेष देखकर संसार में पूजे जाते हैं, वेष के प्रताप से। पर अंत में उनका भेद खुल ही जाता है, वह वेष निभ नहीं पाता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हुआ।
चौपाई
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥
बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत में जाम्बवान और हनुमान जी का हुआ। बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है, यह बात लोक और वेद दोनों में सर्वविदित है।
संग का प्रभाव, धुआं, बादल और वस्त्र के उदाहरण
चौपाई
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥
धूल हवा के साथ से आकाश तक चढ़ जाती है, और वही धूल नीच जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर का तोता-मैना राम-राम स्मरण करता है, और दुष्ट के घर का तोता-मैना गिन-गिनकर गालियां देता है।
चौपाई
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥
धुआं कुसंग के कारण कालिख कहलाता है, वही धुआं सुसंग पाकर सुंदर स्याही बनकर पुराण लिखने के काम आता है। वही जल, अग्नि और वायु के संग से मिलकर बादल बन जाता है, जो जगत को जीवन देने वाला है।
दोहा
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥
ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र, ये सब भी बुरे या अच्छे संयोग पाकर संसार में बुरी या अच्छी वस्तु बन जाते हैं, यह बात विचारशील लोग ही समझ पाते हैं।
दोहा
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥
महीने के दोनों पखवाड़ों में उजाला और अंधेरा समान ही रहता है, पर विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया, एक को शुक्ल और दूसरे को कृष्ण पक्ष कहा। एक को चंद्रमा को बढ़ाने वाला और दूसरे को घटाने वाला समझकर जगत ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दिया।
सर्वव्यापी वंदना, सबमें राम को देखना
दोहा
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥
जगत में जितने भी जड़ और चेतन जीव हैं, उन सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरण-कमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वंदना करता हूं।
चौपाई
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥
देवता, दानव, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और राक्षस, सबको मैं वंदना करता हूं, अब सभी मुझ पर कृपा करें।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ ९ से ११ तक की सामग्री पर आधारित है · वंदना खंड यहां पूर्ण होता है, अगले भाग से कथा-प्रारंभ की भूमिका शुरू होगी
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