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रामचरितमानस | बालकाण्ड, भाग 4

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 4

बालकाण्ड, भाग 4, कवि की विनम्रता एवं राम नाम महिमा

ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित

भाग 3 में वंदना खंड पूर्ण हुआ। इस भाग में तुलसीदास जी एक बहुत ही हृदयस्पर्शी मोड़ लेते हैं, वे स्वयं को एक साधारण, अल्पज्ञ कवि बताते हुए पाठकों से विनम्रता से क्षमा और स्नेह मांगते हैं। साथ ही वे यह भी बताते हैं कि उनकी रचना का मूल्य उनकी काव्य-कुशलता में नहीं, बल्कि इसमें बसे राम नाम में है।

चौरासी लाख योनियों को वंदना

चौपाई
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥ सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
चौरासी लाख योनियों में, जल, थल और आकाश में रहने वाले जितने भी जीव हैं, उन सबको सीता-राममय जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं।

कवि की विनम्रता

चौपाई
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥ निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाहीं॥
मुझे अपना दास जानकर, हे कृपा की खान लोगो, आप सब मिलकर छल छोड़कर मुझ पर स्नेह कीजिए। मुझे अपनी बुद्धि और बल का कोई भरोसा नहीं है, इसीलिए मैं सबसे विनती करता हूं।
चौपाई
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥ सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ॥
मैं श्रीरघुनाथजी के गुणों का वर्णन करना चाहता हूं, पर मेरी बुद्धि छोटी है और श्रीरामजी का चरित्र अथाह है। मुझे इसके लिए एक भी उपाय नहीं सूझता, मेरा मन और बुद्धि कंगाल हैं, पर मनोरथ राजा जैसा बड़ा है।
चौपाई
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी॥ छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई॥
मेरी बुद्धि तो अत्यंत नीची है और चाह बड़ी ऊंची है, चाह तो अमृत पाने की है, पर जगत में जुड़ती छाछ भी नहीं। फिर भी सज्जन मेरी इस ढिठाई को क्षमा करेंगे और मेरे बालवचनों को मन लगाकर सुनेंगे।
चौपाई
जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता॥ हँसिहहिं कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी॥
जैसे जब बालक तोतली बातें कहता है, तो माता-पिता प्रसन्न मन से सुनते हैं। पर क्रूर, कुटिल और बुरे विचारवाले लोग, जिन्हें दूसरों के दोष ही आभूषण के समान प्रिय लगते हैं, वे हंसेंगे।

अपनी रचना और सज्जनों से विनती

दोहा
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास। पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास॥
मेरा भाग्य छोटा है और इच्छा बहुत बड़ी है, पर मुझे एक विश्वास है कि इसे सुनकर सज्जन सभी सुख पाएंगे, और दुष्ट हंसी उड़ाएंगे।
चौपाई
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद न हास रस एहू॥ भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी॥
जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका राम के चरणों में प्रेम है, उनके लिए यह रचना सुखद नहीं, केवल हास्य का विषय होगी। मेरी भाषा रचना और बुद्धि दोनों भोली हैं, यह हंसने योग्य है, इसमें हंसने वालों का कोई दोष नहीं।

राम नाम की महिमा, रचना के मूल्य का असली कारण

चौपाई
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागिहि फीकी॥ हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुबर की॥
जिनको न तो प्रभु के चरणों में प्रीति है और न अच्छी समझ है, उनको यह कथा सुनने में फीकी लगेगी। पर जिनकी हरि और शिव के चरणों में प्रीति है और जिनकी बुद्धि कुतर्क करने वाली नहीं है, उन्हें श्रीरघुनाथजी की यह कथा मधुर लगेगी।
चौपाई
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥ कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू॥
राम-भक्ति से सुशोभित हृदय जानकर सज्जन इसे सुंदर वाणी की सराहना करते हुए सुनेंगे। मैं न तो कवि हूं, न वचनों में कुशल हूं, मैं सभी कलाओं और विद्याओं से रहित हूं।
दोहा
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक। सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह के बिमल बिबेक॥
मेरी रचना सभी गुणों से रहित है, इसमें बस एक ही जगत्प्रसिद्ध गुण है (राम नाम)। इसे विचार कर वही अच्छी बुद्धिवाले लोग सुनेंगे, जिनका विवेक निर्मल है।
चौपाई
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा॥ मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
इस रचना में श्रीरघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यंत पवित्र है और पुराण-वेदों का सार है। यह मंगल का घर और अमंगल को हरने वाला है, जिसे उमा (पार्वती) सहित स्वयं शिवजी सदा जपते हैं।
चौपाई
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥ बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥
अच्छे कवि द्वारा रची हुई कितनी ही अनूठी रचना क्यों न हो, राम नाम के बिना वह शोभा नहीं पाती। जैसे चंद्रमा के समान सुंदर मुखवाली स्त्री भी हर तरह से सजने पर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं पाती।
चौपाई
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥ सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥
इसके विपरीत, कुकवि की रची हुई सब गुणों से रहित वाणी भी, यदि उसमें राम के नाम और यश की छाप हो, तो बुद्धिमान लोग उसे आदरपूर्वक कहते और सुनते हैं, क्योंकि संतजन भौंरे की भांति गुण ग्रहण करने वाले होते हैं।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ १२ से १४ तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 5 में कवि की विनम्रता का शेष भाग एवं ग्रंथ रचना का इतिहास
◄ भाग 3 भाग 4 of ~15-20 भाग 5 →
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