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भगीरथ की कथा

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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भगीरथ की कथा
🙏 भक्ति कथा · पुराण

भगीरथ की कथा

कहानियां · वह तपस्या जिसने धरती पर गंगा को उतार दिया

जब भी कोई किसी असंभव से दिखने वाले काम को अपनी मेहनत और लगन से पूरा कर दिखाता है, तो लोग कहते हैं, यह तो भगीरथ प्रयास है। यह मुहावरा जिस कथा से निकला है, वह है राजा भगीरथ की कथा, जिन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए स्वर्ग की गंगा को धरती पर उतार दिया।

श्राप से भस्म हुए साठ हज़ार पूर्वज

भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र थे। एक बार राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया, जिसका घोड़ा इंद्र देव ने चुराकर महर्षि कपिल के आश्रम के पास बांध दिया। सगर के साठ हज़ार पुत्र घोड़े को ढूंढते हुए वहां पहुंचे और महर्षि कपिल पर घोड़ा चुराने का आरोप लगाने लगे। ध्यानमग्न मुनि की तपस्या भंग होने पर उन्होंने क्रोधित होकर उन सभी राजकुमारों को श्राप देकर भस्म कर दिया।

इस श्राप के कारण उन साठ हज़ार आत्माओं को मुक्ति नहीं मिल पा रही थी। यह बताया गया कि जब तक स्वर्ग की पवित्र गंगा धरती पर आकर उनकी भस्म को स्पर्श नहीं करेगी, तब तक उनकी आत्माओं को शांति नहीं मिलेगी।

पीढ़ियों का प्रयास

सगर के बाद कई पीढ़ियों तक राजाओं ने गंगा को धरती पर लाने का प्रयास किया, पर कोई सफल नहीं हुआ। यह ज़िम्मेदारी अंततः भगीरथ के कंधों पर आई, जो सगर के वंशज थे। भगीरथ ने ठान लिया कि वे अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाकर ही रहेंगे, चाहे इसके लिए कितनी भी बड़ी तपस्या क्यों न करनी पड़े।

ब्रह्माजी की तपस्या

भगीरथ ने राज्य का भार अपने मंत्रियों को सौंपकर हिमालय में जाकर कठोर तपस्या शुरू की। वर्षों की तपस्या के बाद ब्रह्माजी प्रसन्न हुए और प्रकट होकर वरदान दिया कि गंगा धरती पर अवतरित हो सकती हैं। पर एक बड़ी समस्या थी, गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि यदि वे सीधे धरती पर गिरतीं, तो उनके वेग से पूरी पृथ्वी ही विदीर्ण हो जाती।

भगवान शिव की शरण

इस समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माजी ने भगीरथ को भगवान शिव की तपस्या करने की सलाह दी। भगीरथ ने फिर से कठोर तपस्या की, और भगवान शिव प्रसन्न होकर गंगा के प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में समाहित करने के लिए तैयार हो गए। जब गंगा स्वर्ग से उतरीं, तो वे सीधे भगवान शिव की जटाओं में समा गईं, और वहां से धीरे-धीरे, नियंत्रित प्रवाह में धरती पर अवतरित हुईं।

भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा

गंगा जी धरती पर तो अवतरित हो गईं, पर अब उन्हें उस स्थान तक ले जाना था जहां सगर के पुत्रों की भस्म पड़ी थी। भगीरथ अपने रथ पर आगे-आगे चले, और गंगा जी उनके पीछे-पीछे बहती चली गईं। रास्ते में गंगा जी महर्षि जह्नु के आश्रम के पास से गुज़रीं और उनकी तपस्या में विघ्न डाल दिया। क्रोधित होकर जह्नु ऋषि ने पूरी गंगा को पी लिया। भगीरथ ने फिर से उनसे प्रार्थना की, तब जह्नु ऋषि ने प्रसन्न होकर गंगा को अपने कान से मुक्त किया, इसीलिए गंगा जी को जाह्नवी भी कहा जाता है।

अंततः भगीरथ गंगा जी को उस स्थान तक ले गए जहां उनके पूर्वजों की भस्म पड़ी थी। गंगा जल के स्पर्श मात्र से साठ हज़ार आत्माओं को मुक्ति मिल गई, और वे स्वर्गलोक को प्राप्त हुईं।

सीख: भगीरथ की कथा हमें सिखाती है कि यदि लक्ष्य सच्चा हो और प्रयास में निरंतरता हो, तो पीढ़ियों पुरानी समस्या का समाधान भी संभव है। यही कारण है कि आज भी किसी असाधारण, दृढ़ प्रयास को “भगीरथ प्रयास” कहा जाता है, और गंगा नदी को भी कहीं-कहीं भागीरथी के नाम से जाना जाता है, भगीरथ के इसी अथक परिश्रम की याद में।
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