🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 10
बालकाण्ड, भाग 10, नाम महिमा का समापन एवं पहला विश्राम
ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित
भाग 9 में हमने पढ़ा कि तुलसीदास जी नाम को ब्रह्म और राम दोनों से बड़ा क्यों मानते हैं। इस भाग में वे इस बात को सुंदर उदाहरणों से पुष्ट करते हैं, दिखाते हुए कि राम ने स्वयं जो किया, नाम उससे भी कहीं व्यापक फल देता है। यह भाग रामचरितमानस के मासपारायण पाठ की परंपरा में “पहला विश्राम” (पहला पड़ाव) पर समाप्त होता है।
राम ने जो किया, नाम उससे भी आगे
चौपाई
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
श्रीरामजीने एक तपस्विनी स्त्री (अहिल्या) को ही तारा, परन्तु नामने करोड़ों दुष्टोंकी बिगड़ी बुद्धिको सुधार दिया। श्रीरामजीने ऋषि विश्वामित्रके हितके लिये एक ताड़का (सुकेतुकी कन्या) की सेना और पुत्र सहित समाप्ति की।
चौपाई
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू॥
परन्तु नाम अपने भक्तोंके दोष, दुःख और दुराशाओंका इस तरह नाश कर देता है जैसे सूर्य रात्रिको। श्रीरामजीने तो स्वयं शिवजीके धनुषको तोड़ा, परन्तु नामका प्रताप ही संसारके सब भयोंको नाश करनेवाला है।
चौपाई
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन॥
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन॥
प्रभु श्रीरामजीने दण्डक वनको सुहावना बनाया, परन्तु नामने असंख्य मनुष्योंके मनोंको पवित्र कर दिया। श्रीरघुनाथजीने राक्षसोंके समूहको मारा, परन्तु नाम तो कलियुगके सारे पापोंकी जड़ उखाड़नेवाला है।
दोहा
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥
श्रीरघुनाथजीने तो शबरी, जटायु आदि उत्तम सेवकोंको ही मुक्ति दी, परन्तु नामने अगणित दुष्टोंका उद्धार किया। नामके गुणोंकी कथा वेदोंमें प्रसिद्ध है।
चौपाई
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ॥
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे॥
श्रीरामजीने सुग्रीव और विभीषण दोनोंको ही अपने शरणमें रखा, यह सब कोई जानते हैं; परन्तु नामने अनेक गरीबोंपर कृपा की है। नामका यह सुंदर विरद लोक और वेदमें विशेषरूपसे प्रकाशित है।
चौपाई
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा॥
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं॥
श्रीरामजीने तो भालू और बन्दरोंकी सेना बटोरी और समुद्रपर पुल बाँधनेके लिये थोड़ा परिश्रम नहीं किया; परन्तु नाम लेते ही संसार-समुद्र सूख जाता है। सज्जनगण मनमें विचार कीजिए, इन दोनोंमें कौन बड़ा है।
चौपाई
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा॥
राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी॥
श्रीरामचंद्रजीने कुटुम्बसहित रावणको युद्धमें मारा, तब सीतासहित उन्होंने अपने नगर (अयोध्या) में प्रवेश किया। राम राजा हुए, अवध उनकी राजधानी हुई, देवता और मुनि सुंदर वाणीसे जिनके गुण गाते हैं।
चौपाई
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥
परन्तु सेवक (भक्त) प्रेमपूर्वक नामके स्मरणमात्रसे बिना परिश्रम प्रबल मोहकी सेनाको जीतकर प्रेममें मग्न हुए अपने ही सुखमें विचरते हैं। नामके प्रसादसे उन्हें स्वप्नमें भी कोई चिंता नहीं सताती।
समापन दोहा
दोहा
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥
इस प्रकार नाम, ब्रह्म और राम दोनोंसे बड़ा है। यह वरदान देनेवालोंको भी वर देनेवाला है। श्रीशिवजीने अपने हृदयमें यह जानकर ही सौ करोड़ रामचरित्रोंमेंसे इस ‘राम’ नामको साररूपसे चुनकर ग्रहण किया।
॥ मासपारायण, पहला विश्राम ॥
महीने भर के पाठ की परंपरा में यह पहला पड़ाव है, यहां तक पढ़ने के बाद विश्राम लिया जा सकता है
आगे की झलक, नारद का नाम-ज्ञान
चौपाई
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥
नामहीके प्रसादसे शिवजी अविनाशी हैं और अमङ्गल वेषवाले होनेपर भी मङ्गलकी राशि हैं। शुकदेवजी और सनकादि सिद्ध, मुनि, योगीगण नामहीके प्रसादसे ब्रह्मानन्दको भोगते हैं।
चौपाई
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि प्रिय आपू॥
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥
नारदजीने नामके प्रतापको जाना है। हरि सारे संसारको प्यारे हैं, और आप (नारदजी) हरिको प्यारे हैं। नामके जपसे प्रभुने कृपा की, जिससे प्रह्लादजी भक्तशिरोमणि हो गये।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ ४६ से ४७ तक की सामग्री पर आधारित है, और मासपारायण की पहली विश्राम-स्थली पर समाप्त होता है · आगे भाग 11 में नारद, प्रह्लाद और अन्य भक्तों की नाम-महिमा
शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री
प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर
इस अनुष्ठान एवं दैनिक साधना हेतु आवश्यक प्रामाणिक सामग्री
कर्मकांडी आचार्यों के परामर्श अनुसार पूजा-पाठ में केवल शुद्ध धातु के पात्र एवं प्रामाणिक धर्मग्रंथों का ही उपयोग करना चाहिए:
★ 4.9 • गीताप्रेस गोरखपुर
श्रीमद्भगवद्गीता (साधक संजीवनी)
स्वामी रामसुखदास जी टीका (₹450)
अमेज़न पर देखें ↗
★ 4.8 • हरिद्वार प्रमाणित
5-मुखी रुद्राक्ष जाप माला
108+1 मनके वैदिक जाप हेतु (₹499)
अमेज़न पर देखें ↗
शुद्ध पीतल पंचमुखी दीपक, हवन पात्र एवं गंगाजल संग्रह देखें।
संपूर्ण पूजा सामग्री भंडार देखें →
Leave a Reply