सनातन धर्म में किसी भी पूजन, अनुष्ठान या संध्या वंदन की पूर्णता आरती के बिना अधूरी मानी जाती है। आरती का अर्थ ही है—’आ समंतात रतिः’ अर्थात् परमात्मा में संपूर्ण प्रेम और अनन्य अनुराग स्थापित होना। देवाधिदेव महादेव की सर्वाधिक प्रिय और सर्वव्यापी आरती ‘जय शिव ओंकारा’ केवल एक गीत नहीं, अपितु शिव महापुराण और उपनिषदों के अद्वैत दर्शन का साक्षात काव्यमय स्वरूप है। इस पावन लेख में हम आरती के प्रत्येक पद का तात्विक रहस्य और आरती करने के शास्त्रोक्त नियमों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
१. संपूर्ण शिव आरती ‘जय शिव ओंकारा’
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चारु चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी करमाला धारी॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहर्ता॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणशिवजी की आरती जो कोई नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पावे॥ ॐ जय शिव ओंकारा॥
२. आरती के पदों का गूढ़ तात्विक रहस्य (त्रिमूर्ति की एकात्मता)
इस आरती का मुख्य रहस्य यह है कि भगवान शिव, ब्रह्मा और विष्णु में कोई भेद नहीं है। वे एक ही परमात्मा के तीन स्वरूप हैं:
- एकानन, चतुरानन, पंचानन: भगवान सदाशिव एक मुख वाले हैं, ब्रह्मा जी चार मुख वाले हैं और पंचास्य महादेव पंचमुख (सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान) वाले हैं।
- हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन: ब्रह्मा जी का वाहन हंस है, श्रीहरि विष्णु का वाहन गरुड़ है, और महादेव नंदी (वृषभ) पर विराजमान हैं।
- श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघम्बर: ब्रह्मा जी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, भगवान विष्णु पीतांबर धारण करते हैं और भगवान शंकर दिगंबर/बाघंबर (मृगचर्म) सुशोभित करते हैं।
- ‘प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका’: ॐ (प्रणव) में तीन अक्षर हैं—’अ’ (सृष्टि कर्ता ब्रह्मा), ‘उ’ (पालन कर्ता विष्णु), और ‘म’ (संहार कर्ता शिव)। यह ओंकार ही साक्षात सदाशिव का स्वरूप है।
३. आरती करने की शास्त्रोक्त विधि एवं चक्र नियम
| आरती का क्रम | किस अंग के सम्मुख घुमाएं | कितनी बार घुमाएं |
|---|---|---|
| १. प्रथम चरण | भगवान के श्रीचरणों में | ४ बार (चार वेदों के प्रतीक रूप) |
| २. द्वितीय चरण | भगवान की नाभि के सम्मुख | २ बार |
| ३. तृतीय चरण | भगवान के मुखमंडल के सम्मुख | ३ बार (त्रिनेत्र एवं त्रिशूल रूप) |
| ४. चतुर्थ चरण | समस्त श्रीअंगों पर (सर्वांग) | ७ बार |
इस प्रकार आरती की थाली को कुल १४ बार (४+२+३+७) ॐ की आकृति बनाते हुए दक्षिणावर्त (Clockwise) दिशा में घुमाया जाता है।
४. आरती के उपरांत कर्पूर गौरव मंत्र एवं पुष्पांजलि
आरती समाप्त होने पर थाली को नीचे रखें और दोनों हाथों से आरती की पवित्र ज्योति ग्रहण कर नेत्रों व मस्तक पर लगाएं। तत्पश्चात यह पावन मंत्र बोलें:
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
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