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घर के मुख्य द्वार का वास्तु शास्त्र: नकारात्मक ऊर्जा निवारण, तोरण प्रतिष्ठा एवं पद विन्यास

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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॥ वैदिक वास्तु विज्ञान • गृह वास्तु एवं दोष निवारण ॥

वास्तु शास्त्र के प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथों ‘विश्वकर्मा प्रकाश’ और ‘बृहत्संहिता’ में भवन के मुख्य द्वार को ‘सिंह द्वार’ की संज्ञा दी गई है। जैसे मानव शरीर में मुख द्वारा ही प्राणवायु और आहार का प्रवेश होता है, ठीक उसी प्रकार किसी भी भवन में सुख, ऐश्वर्य, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार उसके मुख्य द्वार से ही होता है। यदि मुख्य द्वार वास्तु सम्मत हो तो घर में निरंतर लक्ष्मी का वास रहता है। आज के इस विशेष वास्तु शोध में हम मुख्य द्वार के पद विन्यास, शुभ चिह्नों की प्रतिष्ठा और वास्तु दोष निवारण के अचूक उपायों को समझेंगे।

१. मुख्य द्वार की दिशा एवं ३२ पदों का शास्त्रीय चयन

वास्तु शास्त्र में भवन की परिधि को ३२ पदों (देवताओं) में विभक्त किया गया है। हर दिशा में मुख्य द्वार नहीं बनाया जा सकता:

  • उत्तर दिशा (कुबेर का वास): उत्तर दिशा के ३२ पदों में ‘मुख्य’ और ‘भल्लाट’ पद सर्वोत्तम हैं। यहां द्वार होने से अपार धन-संपत्ति और व्यापार में उन्नति होती है।
  • पूर्व दिशा (इंद्र एवं सूर्य): पूर्व दिशा में ‘जयंत’ और ‘इंद्र’ पद अति शुभ माने गए हैं। यह पद समाज में मान-सम्मान और संतानों को तेजस्विता प्रदान करता है।
  • दक्षिण दिशा (यम पद): दक्षिण दिशा में सामान्यतः द्वार वर्जित है, किंतु यदि दक्षिण में द्वार हो तो केवल ‘गृहक्षत’ या ‘वितथ’ पद पर ही शुभ फल प्राप्त होता है।
  • पश्चिम दिशा (वरुण देव): पश्चिम में ‘पुष्पदंत’ और ‘वरुण’ पद शुभ होते हैं।

२. मुख्य द्वार की बनावट एवं आकार के अनिवार्य नियम

वास्तु नियम शास्त्रोक्त निर्देश गलत होने पर दुष्प्रभाव
कपाटों की संख्या सदा दो पल्ले (द्विकपाट) होने चाहिए। अंदर की ओर खुलना चाहिए। एक पल्ले का द्वार या बाहर खुलने वाला द्वार गृहस्वामी में मानसिक तनाव बढ़ाता है।
ध्वनि रहित कपाट खोलते-बंद करते समय चरमराने (चीं-चीं) की आवाज नहीं होनी चाहिए। कपाट की ध्वनि घर में आकस्मिक कलह और आर्थिक हानि का कारण बनती है।
देहरी (दहलीज) की अनिवार्यता द्वार के नीचे काष्ठ या संगमरमर की देहरी अवश्य बनी होनी चाहिए। बिना देहरी के घर में नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष सीधे प्रवेश करते हैं।

३. शुभ प्रतीक एवं तोरण प्रतिष्ठा के नियम

मुख्य द्वार को सदैव मांगलिक वस्तुओं से सुसज्जित रखना चाहिए:

  1. आम्रपल्लव एवं अशोक का तोरण: ताजे आम के पत्तों और गेंदे के पुष्पों का तोरण नकारात्मक ऊर्जा को द्वार पर ही रोक देता है। प्रत्येक मंगलवार या शुक्रवार को इसे बदलना चाहिए।
  2. शुभ-लाभ एवं ॐ: सिंदूर और घी मिलाकर द्वार के दोनों ओर ‘शुभ’ और ‘लाभ’ तथा मध्य में पावन ‘ॐ’ का अंकन करें।
  3. जल से भरा उरली पात्र: मुख्य द्वार के पास पीतल के पात्र में शुद्ध जल भरकर उसमें ताजे पीले पुष्प रखने से घर में धन का अपव्यय रुकता है।
  4. संध्या दीप प्रज्वलन: गोधूलि वेला में मुख्य द्वार की देहरी पर गाय के घी या तिल के तेल का एक दीपक नित्य प्रज्वलित करना चाहिए। इससे अलक्ष्मी का निवारण होता है।

४. द्वार वेध दोष और उसके सरल वैदिक निवारण

यदि मुख्य द्वार के ठीक सामने कोई खंभा (स्तंभ वेध), बड़ा वृक्ष (वृक्ष वेध), कुआं, या गली का सीधा मोड़ (मार्ग वेध) हो, तो इसे बड़ा वास्तु दोष माना जाता है।

सरल निवारण उपाय: द्वार के ऊपर पंचमुखी हनुमान जी का चित्र स्थापित करें, देहरी के नीचे चांदी का तार अथवा तांबे का स्वास्तिक स्थापित करें, और द्वार पर तुलसी का पौधा रखें।

आलेख: पंडित शिवम तिवारी | ज्योतिषाचार्य एवं कर्मकांड विशेषज्ञ
प्रकाशित: PanditDarshan.com — प्रामाणिक सनातन धर्म, वेद एवं पूजा-पाठ का पावन मंच।
शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

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