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श्री सत्यनारायण व्रत एवं पूजन विधि: संपूर्ण सामग्री तालिका, कलश स्थापना, पंच अध्याय कथा एवं आरती

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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॥ स्कंद पुराणोक्त रेवाखंड • सत्यनारायण पूजन विधान ॥

कलियुग में सभी प्रकार के कष्टों, दरिद्रता, गृह-क्लेश और संकटों के निवारण हेतु ‘श्री सत्यनारायण व्रत एवं कथा’ को सर्वोत्तम एवं सुगम साधन बताया गया है। स्कंद पुराण के रेवाखंड में महर्षि सूत जी ने शौनकादि ऋषियों को उपदेश देते हुए कहा था कि जो मनुष्य भक्तिभाव से भगवान सत्यनारायण का पूजन करता है, वह इस लोक में सुख-समृद्धि भोगकर अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है। पूर्णिमा, संक्रांति या किसी भी शुभ गुरुवार को यह पावन अनुष्ठान संपन्न किया जा सकता है। आइए, इसकी संपूर्ण शास्त्रीय सामग्री, वेदी निर्माण और पूजन विधि को समझें।

१. अनिवार्य पूजन सामग्री तालिका

वर्ग सामग्री का नाम मात्रा / विशेष निर्देश
मंडप व प्रतिष्ठा केले के चार छोटे खंभे, लाल व पीला वस्त्र, आम्रपल्लव मंडप के चारों कोनों पर केले के पेड़ बांधे जाते हैं
कलश सामग्री तांबे या पीतल का कलश, जटा नारियल, मौली, अक्षत, सुपारी कलश पर कलावा बांधकर पांच आम के पत्ते रखें
पञ्चामृत गाय का कच्चा दूध, दही, देसी घी, शहद, गंगाजल, बूरा/शर्करा तुलसी दल अवश्य मिश्रित करें
विशेष प्रसाद (सपाद भक्ष्य) गेहूं का आटा (घी में भुना हुआ), शक्कर, केला, पंचमेवा सवा भाग (सवा पाव, सवा किलो) का नियम है
पूजन द्रव्य रोली, चंदन, हल्दी, जनेऊ जोड़ा, ऋतु फल, पान के पत्ते, लौंग भगवान नारायण को पीले पुष्प व तुलसी मंजरी प्रिय है

२. चरणबद्ध पूजन एवं अनुष्ठान विधि

  1. शुद्धिकरण एवं संकल्प: पूर्वाभिमुख बैठकर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प और सिक्का लेकर नाम, गोत्र और मनोरथ बोलकर संकल्प करें।
  2. गणपति एवं नवग्रह पूजन: सर्वप्रथम विघ्नहर्ता श्री गणेश और गौरी जी का पंचोपचार पूजन करें, तत्पश्चात वरुण देव (कलश) और नवग्रहों का आवाहन करें।
  3. भगवान सत्यनारायण का षोडशोपचार पूजन: शालिग्राम या श्री सत्यनारायण भगवान की प्रतिमा को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं। पीत वस्त्र, यज्ञोपवीत, पीला चंदन, और अक्षत अर्पित करें।
  4. तुलसी दल अर्पण: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हुए भगवान को सपाद भक्ष्य पंजीरी प्रसाद और तुलसी दल अर्पित करें।

३. पंच अध्याय कथा का संक्षिप्त आध्यात्मिक सार

  • प्रथम अध्याय: नारद जी का भगवान विष्णु से प्रश्न और भगवान द्वारा कलियुग में सत्यनारायण व्रत की महत्ता का कथन।
  • द्वितीय अध्याय: काशी के निर्धन सतानंद ब्राह्मण की कथा और तृण बेचने वाले काष्ठ विक्रेता का उद्धार।
  • तृतीय अध्याय: राजा उल्कामुख और साधु वैश्य की कथा, पुत्र प्राप्ति की प्रतिज्ञा और उसका विस्मरण।
  • चतुर्थ अध्याय: साधु वैश्य और जामाता का कारागार में जाना, धन नाश, और सत्यनारायण प्रसाद ग्रहण करने पर संकट से मुक्ति।
  • पंचम अध्याय: राजा तुंगध्वज द्वारा प्रसाद की उपेक्षा करने पर समस्त पुत्र-पौत्र व साम्राज्य का विनाश, और पुनः नतमस्तक होकर प्रसाद लेने पर समृद्धि।

४. आरती एवं प्रसाद वितरण के नियम

कथा श्रवण के उपरांत भगवान सत्यनारायण की कपूर से आरती करें। सभी उपस्थित जनों में चरणामृत और पंजीरी प्रसाद वितरित करें। साधक को प्रसाद का कभी अनादर नहीं करना चाहिए और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करके ही व्रत खोलना चाहिए।

आलेख: पंडित शिवम तिवारी | ज्योतिषाचार्य एवं कर्मकांड विशेषज्ञ
प्रकाशित: PanditDarshan.com — प्रामाणिक सनातन धर्म, वेद एवं पूजा-पाठ का पावन मंच।
शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

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