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रमा एकादशी 2026: व्रत महात्म्य, पारण समय व पूजा विधि

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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रमा एकादशी 2026 • कार्तिक कृष्ण एकादशी व्रत एवं पारण विधान

त्वरित दर्शन (संक्षिप्त परिचय)

दीपावली महापर्व से ठीक पूर्व पड़ने वाली रमा एकादशी का पावन व्रत गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। माता लक्ष्मी का एक नाम ‘रमा’ भी है, अतः इस दिन भगवान केशव के साथ माता रमा (महालक्ष्मी) की युगल उपासना करने से दरिद्रता का नाश होता है।

रमा एकादशी व्रत के पारण का सर्वश्रेष्ठ शास्त्रोक्त समय शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को प्रातः 06:36 बजे से 10:31 बजे तक रहेगा। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व पारण संपन्न करना अनिवार्य है।

1. रमा एकादशी 2026 पंचांग एवं पारण समय सारणी (Panchang & Paran Table)

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, एकादशी व्रत का फल तभी प्राप्त होता है जब द्वादशी तिथि के भीतर और ‘हरि वासर’ समाप्त होने के उपरांत पारण किया जाए।

पंचांग घटक (Panchang Element) समय एवं विवरण (वर्ष 2026) शास्त्रीय संदर्भ / टिप्पणी
एकादशी तिथि प्रारंभ 4 नवंबर 2026, प्रातः 11:03 बजे पंचांग गणना आरंभ
एकादशी तिथि समाप्त 5 नवंबर 2026, प्रातः 10:36 बजे उदयातिथि अनुसार व्रत 5 नवंबर को मान्य
एकादशी व्रत दिवस 5 नवंबर 2026, गुरुवार संपूर्ण दिन व रात्रि निराहार / फलाहार
द्वादशी तिथि प्रारंभ 5 नवंबर 2026, प्रातः 10:36 बजे से द्वादशी तिथि लगेगी
द्वादशी तिथि समाप्त 6 नवंबर 2026, प्रातः 10:31 बजे तक इसके भीतर पारण अनिवार्य है
पारण का शुभ समय (Paran Window) 6 नवंबर 2026: प्रातः 06:36 से 10:31 बजे तक सर्वश्रेष्ठ पारण काल (अवधि 3 घंटे 55 मिनट)
हरि वासर समाप्ति 5 नवंबर की रात्रि 04:18 बजे सूर्योदय से पूर्व समाप्त
नक्षत्र एवं योग पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र एवं वैधृति योग धन वृद्धि एवं पाप विनाशन योग
पंडित शिवम तिवारी का शास्त्रीय परामर्श (E-E-A-T मार्गदर्शन):
“रमा एकादशी दीपावली से ठीक चार दिन पहले आती है। इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करना और सायंकाल तुलसी के चौबारे में गाय के घी का अखंड दीपक जलाना अति अनिवार्य है। ध्यान रहे कि एकादशी तिथि को स्वयं तुलसी पत्र तोड़ना वर्जित है; अतः पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पूर्व (दशमी की शाम) ही तोड़कर रख लें। पारण के दिन प्रातः 06:36 से 10:31 के बीच किसी योग्य ब्राह्मण को अन्न-दक्षिणा देकर ही स्वयं फलाहार अथवा सात्विक अन्न ग्रहण करें।”

2. रमा एकादशी एवं तुलसी पूजन विधान (Tulsi Pujan & Shodashopachar)

कार्तिक मास में तुलसी पूजन का महात्म्य सहस्र गुना माना गया है। रमा एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता महालक्ष्मी की संयुक्त पूजा की जाती है:

षोडशोपचार पूजन के चरण:

  1. प्रातः स्नान एवं संकल्प: प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले जल से स्नान करें और पीले वस्त्र धारण करें।
  2. कलश एवं विष्णु-लक्ष्मी स्थापना: चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
  3. पंचामृत अभिषेक: दक्षिणावर्ती शंख में कच्चा दूध, गंगाजल और केसर भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें:

$$text{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्री सिद्ध लक्ष्म्यै नमः॥}$$
4. तुलसी अर्चन: भगवान विष्णु के चरणों में तुलसी मंजरी और पीले गेंदे के पुष्प अर्पित करें।
5. सायंकालीन तुलसी दीपदान: सूर्यास्त के समय तुलसी के पौधे के पास 11 या 21 गोघृत के दीपक प्रज्वलित करें और 7 बार परिक्रमा करें।

3. रमा एकादशी की प्रामाणिक पौराणिक कथा (Shobhan & Chandrasena Katha)

हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर एकाग्रचित्त होकर यह कथा श्रवण करें:

पौराणिक काल में मुचुकुंद नाम के एक परम प्रतापी और सत्यवादी राजा राज्य करते थे। देवराज इंद्र और वरुण भी उनके मित्र थे। राजा मुचुकुंद की एक अत्यंत धर्मपरायण और सुंदर कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। चंद्रभागा का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था।

राजकुमार शोभन स्वभाव से अत्यंत दुर्बल और कोमल शरीर के थे। एक बार कार्तिक मास में शोभन अपनी ससुराल आए हुए थे। उसी समय कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का दिन आ गया।

राजा मुचुकुंद के राज्य में यह कठोर राजकीय नियम था कि एकादशी के दिन राज्य के किसी भी मनुष्य, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों को भी अन्न नहीं दिया जाता था। सभी को पूर्ण उपवास रखना पड़ता था।

शोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा से कहा— “हे प्रिये! मैं भूख सहन करने में सर्वथा असमर्थ हूँ। यदि मैंने कुछ नहीं खाया, तो निश्चित ही मेरे प्राण निकल जाएंगे। कृपा करके मुझे कोई उपाय बताओ।”

चंद्रभागा ने अत्यंत विनीत भाव से कहा— “हे स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन किसी को भी भोजन करने की अनुमति नहीं है। यदि आप जीवित रहना चाहते हैं, तो आपको इस नगर से बाहर जाना होगा। यदि आप यहाँ रहेंगे, तो आपको नियमों का पालन करते हुए व्रत रखना ही पड़ेगा।”

शोभन ने विचार किया और कहा— “मैं कायरों की भाँति भागूँगा नहीं। भाग्य में जो होगा देखा जाएगा, मैं भी यह व्रत करूँगा।”

शोभन ने रमा एकादशी का निर्जला व्रत प्रारंभ किया। दिन तो जैसे-तैसे बीत गया, परंतु रात्रि आते-आते भूख और प्यास की ज्वाला से शोभन अत्यंत व्याकुल हो गए और सूर्योदय से पूर्व ही उनके प्राण-पखेरू उड़ गए।

चंद्रभागा अत्यंत दुखी हुई, परंतु उसने अपने पति का अंतिम संस्कार करवाकर अपना जीवन पिता के घर में भगवान विष्णु की भक्ति में समर्पित कर दिया। उसने प्रत्येक एकादशी का व्रत नियमपूर्वक जारी रखा।

उधर, रमा एकादशी के पुण्य प्रभाव से शोभन को मृत्यु के उपरांत मंदराचल पर्वत के शिखर पर स्थित एक दिव्य और अलौकिक देवपुरी का साम्राज्य प्राप्त हुआ। वह देवपुरी स्वर्ण, मणियों और अप्सराओं से सुसज्जित थी।

एक दिन राजा मुचुकुंद के नगर का एक सोमशर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करते हुए मंदराचल पर्वत पर पहुँचा। उसने वहाँ शोभन को सिंहासन पर विराजमान देखा। पहचान होने पर ब्राह्मण ने शोभन से पूछा— “हे राजन! आपको यह दुर्लभ ऐश्वर्य कैसे प्राप्त हुआ?”

शोभन ने कहा— “हे विप्रवर! यह सब कार्तिक कृष्ण रमा एकादशी के व्रत का फल है। परंतु यह वैभव ‘अस्थिर’ है, क्योंकि मैंने यह व्रत श्रद्धा से नहीं, अपितु विवशता में किया था। यदि मेरी पतिव्रता पत्नी चंद्रभागा अपने जीवन भर के संचित एकादशी व्रतों का पुण्य मुझे समर्पित करे, तो यह साम्राज्य चिरस्थायी और अचल हो सकता है।”

सोमशर्मा ने लौटकर यह वृत्तांत चंद्रभागा को सुनाया। चंद्रभागा अत्यंत हर्षित हुई। उसने महर्षि वामदेव के आश्रम में जाकर अपने सभी एकादशी व्रतों का संचित पुण्य अपने पति शोभन को समर्पित कर दिया।

चंद्रभागा के उस अगाध पुण्य के प्रभाव से शोभन का वह दिव्य नगर अखंड और अचल हो गया। चंद्रभागा अपने दिव्य रूप में अपने पति के साथ उस परम धाम में आनंदपूर्वक निवास करने लगी।

4. द्वादशी पारण विधि एवं मंत्र (Paran Vidhi)

शुक्रवार, 6 नवंबर को प्रातः 06:36 से 10:31 बजे के मध्य पारण संपन्न करें:

  1. प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु को तुलसी दल और माखन-मिश्री का भोग लगाएं।
  2. किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को पीले वस्त्र, अन्न (गेहूं/चावल), और दक्षिणा दान करें।
  3. पारण मंत्र:

$$text{एकादश्यामुपवसन् द्वादश्यां परतोऽहम्।}$$ $$text{भुंजेऽहं पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥}$$ (हे कमलनयन भगवान विष्णु! मैंने एकादशी को उपवास किया है, अब द्वादशी को आपके प्रसाद स्वरूप भोजन ग्रहण कर रहा हूँ। आप मेरे रक्षक हों।)

  1. चरणामृत ग्रहण करके सात्विक भोजन से पारण करें।

5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. 1: रमा एकादशी 2026 में पारण का सही समय क्या है? उत्तर: रमा एकादशी का पारण शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को प्रातः 06:36 बजे से प्रातः 10:31 बजे तक किया जाएगा।

प्र. 2: क्या रमा एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं? उत्तर: नहीं, सनातन धर्म में किसी भी एकादशी पर चावल का सेवन पूर्णतः वर्जित है। मान्यता है कि एकादशी को चावल खाने से महर्षि मेधा के मांस-भक्षण के समान दोष लगता है।

प्र. 3: रमा एकादशी के व्रत से क्या फल मिलता है? उत्तर: पद्म पुराण के अनुसार रमा एकादशी का व्रत करने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं और साधक को कामधेनु और चिंतामणि के समान समस्त ऐश्वर्य और बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है।

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