सावित्री और सत्यवान की कथा
यह कहानी सुनकर लगता है कि प्रेम और दृढ़ निश्चय के आगे कुछ भी असंभव नहीं। सावित्री की कथा महाभारत में आती है, और आज भी करवा चौथ जैसे व्रतों की भावना के मूल में यही कहानी बसी है, एक स्त्री का अपने पति के प्रति इतना गहरा प्रेम कि वह स्वयं मृत्यु के देवता से भी अपने पति को वापस मांग लेती है।
सावित्री का जन्म और विवाह की ज़िद
राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। वर्षों की तपस्या के बाद उन्हें एक कन्या प्राप्ति का वरदान मिला, जिसका नाम सावित्री रखा गया। बड़ी होने पर जब सावित्री के विवाह की बात आई, तो उसने स्वयं वर चुनने की इच्छा जताई। भ्रमण करते हुए सावित्री की भेंट सत्यवान से हुई, जो एक वनवासी राजा की संतान थे, अत्यंत गुणी और तेजस्वी, पर उनका राज्य छिन चुका था और वे वन में सामान्य जीवन जी रहे थे।
सावित्री ने सत्यवान से विवाह करने का निश्चय कर लिया। जब यह बात नारद मुनि को पता चली, तो उन्होंने चेतावनी दी कि सत्यवान अत्यंत गुणी हैं, पर उनके भाग्य में एक ही दोष है, वे ठीक एक वर्ष बाद मृत्यु को प्राप्त होंगे। यह सुनकर भी सावित्री का निश्चय नहीं डगमगाया, उसने कहा कि जो वर एक बार मन से चुन लिया, वह सदा के लिए चुन लिया।
विवाह के बाद का जीवन
विवाह के बाद सावित्री अपने राजसी वस्त्र और आभूषण त्यागकर वन में सत्यवान के माता-पिता की सेवा में रहने लगी। समय बीतता गया, पर सावित्री के मन से नारद मुनि की वह बात कभी नहीं गई। जैसे-जैसे मृत्यु का दिन नज़दीक आता गया, सावित्री ने तीन दिन पहले से ही व्रत रखना शुरू कर दिया।
वह निर्णायक दिन
जिस दिन सत्यवान की मृत्यु निश्चित थी, उस दिन सावित्री ने पहली बार उनके साथ वन में लकड़ी काटने चलने की ज़िद की। वन में सत्यवान को अचानक सिर में तेज़ पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। कुछ ही समय बाद सावित्री ने देखा कि स्वयं यमराज, अपने वास्तविक रूप में, सत्यवान के प्राण लेने आ पहुंचे हैं।
यमराज ने सत्यवान की आत्मा को अपने पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चलना शुरू किया। सावित्री भी चुपचाप उनके पीछे चलने लगी। यमराज ने कई बार उसे लौट जाने को कहा, पर सावित्री ने विनम्रता से उत्तर दिया कि जहां मेरे पति जाएंगे, वहां पत्नी का धर्म भी साथ चलने का है।
सावित्री की बुद्धिमत्ता
यमराज सावित्री के धैर्य और उसकी शास्त्रोक्त बातों से प्रसन्न हुए, और उन्होंने सावित्री से सत्यवान के प्राण के अतिरिक्त कोई भी वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने बड़ी चतुराई से एक के बाद एक वरदान मांगे, अपने सास-ससुर की खोई हुई आंखें और राज्य वापस मिले, अपने पिता को पुत्र प्राप्ति हो, और स्वयं उसे सौ पुत्रों की प्राप्ति हो।
यमराज ने बिना सोचे यह सभी वरदान दे दिए। पर जब यमराज आगे बढ़े, तो सावित्री ने विनम्रता से पूछा, हे यमराज, आपने मुझे सौ पुत्रों का वरदान दिया है, पर बिना पति के यह वरदान कैसे पूर्ण होगा? यह सुनकर यमराज ठिठक गए, वे समझ गए कि सावित्री ने अपनी बुद्धि से उन्हें ही बांध लिया है। प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।
सत्यवान का पुनर्जीवन
सावित्री जब सत्यवान के शरीर के पास लौटी, तो सत्यवान ऐसे उठ बैठे जैसे गहरी नींद से जागे हों। दोनों जब घर लौटे, तो पता चला कि सत्यवान के माता-पिता की आंखें वापस आ गई थीं और उनका खोया राज्य भी उन्हें पुनः प्राप्त हो गया था, ठीक वैसे ही जैसे सावित्री ने यमराज से मांगा था।
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