🚩 रामायण · बालकाण्ड · भाग 8
बालकाण्ड, भाग 8, वंदना समापन एवं राम नाम की गूढ़ महिमा
ग्रंथालय · मूल श्लोक, चौपाई, दोहा एवं हिंदी भावार्थ सहित
भाग 7 में हमने अयोध्या और परिवार की वंदना पढ़ी। इस भाग में तुलसीदास जी हनुमान जी, वानर सेना, सीता माता की वंदना के साथ पूरे वंदना खंड को पूर्ण करते हैं, और फिर एक अत्यंत गहरा विषय शुरू होता है, स्वयं “राम” नाम के दो अक्षरों का रहस्यमय और अद्भुत महत्व।
हनुमान एवं वानर सेना वंदना
सोरठा
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
मैं पवनकुमार श्रीहनुमानजी को प्रणाम करता हूं, जो दुष्टरूपी वनको भस्म करनेके लिये अग्निरूप हैं, जो ज्ञानकी घनमूर्ति हैं और जिनके हृदयरूपी भवनमें धनुष-बाण धारण किये श्रीरामजी निवास करते हैं।
चौपाई
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥
बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥
वानरों के राजा सुग्रीवजी, रीछों के राजा जाम्बवानजी, राक्षसों के राजा विभीषणजी और अंगदजी आदि जितना वानरों का समाज है, उन सबके सुंदर चरणों की मैं वंदना करता हूं, जिन्होंने अधम (पशु और राक्षस आदि) शरीर में भी श्रीरामचंद्रजी को प्राप्त कर लिया।
चौपाई
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥
पशु, पक्षी, देवता, मनुष्य, असुरसमेत जितने भी श्रीरामजी के चरणों के उपासक हैं, मैं उन सबके चरणकमलों की वंदना करता हूं, जो श्रीरामजी के निष्काम सेवक हैं।
चौपाई
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद॥
प्रनवउँ सबहि धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥
शुकदेवजी, सनकादि, नारदमुनि आदि जितने भक्त और परम ज्ञानी श्रेष्ठ मुनि हैं, मैं धरतीपर सिर टेककर उन सबको प्रणाम करता हूं, हे मुनीश्वरो, आप सब मुझको अपना दास जानकर कृपा कीजिए।
सीता माता वंदना
चौपाई
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥
राजा जनककी पुत्री, जगत्की माता श्रीजानकीजी, करुणानिधान श्रीरामचंद्रजीकी प्रियतमा हैं, उनके दोनों चरणकमलोंको मैं मनाता हूं, जिनकी कृपासे निर्मल बुद्धि पाऊं।
दोहा
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥
जो वाणी और उसके अर्थ तथा जल और जलकी लहरके समान कहनेमें अलग-अलग हैं, परन्तु वास्तवमें अभिन्न (एक) हैं, उन श्रीसीतारामजीके चरणोंमें मैं वन्दना करता हूं, जिन्हें दीन-दुखी बहुत ही प्रिय हैं।
राम नाम के दो अक्षरों की गूढ़ महिमा
चौपाई
बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
मैं श्रीरघुनाथजीके नाम ‘राम’ की वन्दना करता हूं, जो कृशानु (अग्नि), भानु (सूर्य) और हिमकर (चंद्रमा) का हेतु अर्थात ‘र’ ‘आ’ और ‘म’ रूपसे बीज है। वह ‘राम’ नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप है। वह वेदोंका प्राण है; निर्गुण, उपमारहित और गुणोंका भण्डार है।
चौपाई
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥
जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्रीशिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशीमें मुक्तिका कारण है, तथा जिसकी महिमाको गणेशजी जानते हैं, जो इस ‘राम’ नामके प्रभावसे ही सबसे पहले पूजे जाते हैं।
चौपाई
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जिय जानकी नाथ भवानी॥
आदिकवि श्रीवाल्मीकिजी रामनामके प्रतापको जानते हैं, जो उलटा नाम (‘मरा’, ‘मरा’) जपकर पवित्र हो गये। श्रीशिवजीके इस वचनको सुनकर कि एक राम-नाम सहस्र नामके समान है, पार्वतीजी सदा अपने पति (श्रीशिवजी) के साथ रामनामका जप करती रहती हैं।
चौपाई
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को॥
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥
नामके प्रति पार्वतीजीके हृदयकी ऐसी प्रीति देखकर श्रीशिवजी हर्षित हो गये और उन्होंने स्त्रियोंमें भूषणरूप (पतिव्रताओंमें शिरोमणि) पार्वतीजीको अपना भूषण बना लिया। नामके प्रभावको श्रीशिवजी भलीभांति जानते हैं, जिस प्रभावके कारण कालकूट जहरने उनको अमृतका फल दिया।
राम नाम, वर्षा ऋतु और भक्ति का बीज
दोहा
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति वर्षा-ऋतु है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उत्तम सेवकगण धान हैं और ‘राम’ नामके दो सुन्दर अक्षर सावन-भादोंके महीने हैं (जिनसे भक्तिरूपी फसल पकती है)।
चौपाई
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू॥
दोनों अक्षर मधुर और मनोहर हैं, जो वर्णमालारूपी शरीरके नेत्र हैं, भक्तोंके जीवन हैं तथा स्मरण करनेमें सबके लिये सुलभ और सुख देनेवाले हैं, जो इस लोकमें लाभ और परलोकमें निर्वाह करते हैं।
चौपाई
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता॥
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन॥
ये दोनों अक्षर नर-नारायणके समान सुंदर भाई हैं, जो जगत्का पालन और विशेषरूपसे भक्तोंकी रक्षा करनेवाले हैं। ये भक्तिरूपिणी सुंदर स्त्रीके कानोंके सुंदर आभूषण (कर्णफूल) हैं और जगत्के हितके लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं।
दोहा
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ॥
तुलसीदासजी कहते हैं, श्रीरघुनाथजीके नामके दोनों अक्षर बड़ी शोभा देते हैं, जिनमेंसे एक (रकार) छत्ररूप (रेफ़) से और दूसरा (मकार) मुकुटमणि (अनुस्वार) रूपसे सब अक्षरोंके ऊपर हैं।
यह भाग मूल पुस्तक के पृष्ठ ४० से ४२ तक की सामग्री पर आधारित है · आगे भाग 9 में राम नाम की महिमा का शेष भाग एवं ग्रंथ रचना काल का वर्णन
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