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अहोई अष्टमी 2026: संतान दीर्घायु व्रत, पूजा मुहूर्त, स्याहू माता पूजा विधि एवं तारों को अर्घ्य का समय

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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अहोई अष्टमी 2026 • संतान रक्षा व्रत, तारा अर्घ्य एवं पूजा विधि

त्वरित दर्शन (संक्षिप्त परिचय)

वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी का पावन निर्जला व्रत सोमवार, 2 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का प्रारंभ 1 नवंबर 2026 की रात्रि 10:24 बजे से होकर 2 नवंबर 2026 की रात्रि 08:38 बजे तक रहेगा।

अहोई माता की पूजा का सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त 2 नवंबर की शाम 05:38 बजे से शाम 06:56 बजे तक (अवधि: 1 घंटा 18 मिनट) रहेगा। इस दिन माताएं शाम को तारों को अर्घ्य देकर शाम 06:12 बजे व्रत का संकल्प पूर्ण करेंगी। अहोई अष्टमी के दिन रात्रि में चंद्रोदय का समय रात्रि 11:46 बजे होगा।

1. अहोई अष्टमी 2026 पंचांग एवं त्रि-बिंदु मुहूर्त सारणी (Panchang & Muhurat)

पद्म पुराण एवं धर्मसिंधु के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि में किया जाता है, जिसमें तारों के उदय काल में अर्घ्य प्रदान करने का विशेष महात्म्य है।

पंचांग घटक (Panchang Element) विवरण (वर्ष 2026) शास्त्रीय संदर्भ / टिप्पणी
व्रत की तिथि 2 नवंबर 2026, सोमवार कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी
अष्टमी तिथि प्रारंभ 1 नवंबर 2026, रात्रि 10:24 बजे पंचांग गणना आरंभ
अष्टमी तिथि समाप्त 2 नवंबर 2026, रात्रि 08:38 बजे इसके पश्चात नवमी तिथि लगेगी
अहोई माता मुख्य पूजा मुहूर्त शाम 05:38 से शाम 06:56 बजे तक प्रदोष काल शुभ मुहूर्त (1 घंटा 18 मिनट)
शाम को सांझ तारा दर्शन (अर्घ्य समय) शाम 06:12 बजे तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलने का समय
अहोई अष्टमी चंद्रोदय समय रात्रि 11:46 बजे जो माताएं चंद्रमा को अर्घ्य देती हैं
राहुकाल (वर्जित समय) प्रातः 07:54 से प्रातः 09:18 बजे तक इस समय पूजा की तैयारी या संकल्प न करें
नक्षत्र एवं शुभ योग पुष्य नक्षत्र एवं शुक्ल योग अत्यंत कल्याणकारी एवं संतान रक्षक योग
पंडित शिवम तिवारी का शास्त्रीय परामर्श (E-E-A-T मार्गदर्शन):
“अहोई अष्टमी के व्रत में अधिकांश माताएं तारों को देखकर अर्घ्य देती हैं, क्योंकि इस दिन चंद्रोदय बहुत देर से (रात्रि 11:46 बजे) होता है। यदि आपके कुल की परंपरा तारों को अर्घ्य देने की है, तो शाम 06:12 बजे आकाश में प्रथम तारा दृष्टिगोचर होते ही तांबे के लोटे से अर्घ्य प्रदान कर लें। जो महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना से यह व्रत रख रही हैं, वे राधा कुंड (मथुरा) में मध्यरात्रि स्नान अथवा घर में गंगाजल मिले जल से स्नान कर शिव-पार्वती की युगल उपासना अवश्य करें।”

2. अहोई माता (स्याहू माता) पूजा सामग्री सूची (Checklist)

पूजा की संपूर्ण सामग्री को पूर्व में ही व्यवस्थित कर लें। आप हमारी संपूर्ण वैदिक पूजा सामग्री सूची भी देख सकते हैं।

  • चौकी एवं वस्त्र: लकड़ी की चौकी (पाटा), लाल नया वस्त्र, गंगाजल।
  • चित्र / अंकन: दीवार पर गेरू और चावल के घोल (ऐपन) से बना अहोई माता का चित्र (जिसमें 8 कोष्ठक, स्याहू माता और उनके 7 बच्चे अंकित हों) अथवा अहोई माता का कैलेंडर।
  • चांदी की अहोई (स्याहू माला): चांदी का अहोई पेंडेंट और चांदी के दो नए गोल मनके (दाने), कलावा।
  • पात्र एवं कलश: मिट्टी का एक नया करवा अथवा तांबे का लोटा (जिसमें जल भरा हो), करवे का ढक्कन, जल से भरा एक कांस्य/पीतल का लोटा।
  • भोग सामग्री: घर पर बने गेहूं के आटे और गुड़ के 8 पुए, 8 पूरियां, सिंघाड़ा, मूली, दूध-भात (चावल), ऋतुफल और बताशे।
  • दान सामग्री: सास या ननद को देने हेतु बायना (वस्त्र, दक्षिणा, फल और मीठे पुए)।

3. चांदी की अहोई (स्याहू माला) का शास्त्रोक्त नियम

अहोई अष्टमी की पूजा में चांदी की अहोई और मनकों का विशेष महत्व होता है:

  1. चांदी का पेंडेंट: चांदी की अहोई में स्याहू माता का अंकन होता है।
  2. प्रतिवर्ष मनके जोड़ना: विवाह के प्रथम वर्ष दो चांदी के मनके (दाने) पिरोए जाते हैं। इसके पश्चात परिवार में जितने बच्चे होते हैं अथवा प्रतिवर्ष पूजा में दो-दो चांदी के दाने इस माला में जोड़े जाते हैं।
  3. धारण करने की विधि: पूजा के समय इस माला को रोली, अक्षत और दूध से पवित्र करके अहोई माता को अर्पित किया जाता है। कथा श्रवण और अर्घ्य के उपरांत माताएं इसे अपने गले में धारण करती हैं और दीपावली के दिन इसे पुनः उतारकर सुरक्षित रख लेती हैं।

4. षोडशोपचार अहोई अष्टमी पूजा विधि (Step-by-Step Ritual)

शाम को शुभ मुहूर्त (05:38 से 06:56 बजे) में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) दिशा में पूजा स्थल सजाएं।

चरण 1: अहोई माता की स्थापना एवं कलश स्थापन

दीवार पर अहोई माता का चित्र लगाएं। चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएं। चौकी के ऊपर एक जल से भरा करवा रखें और करवे के ढक्कन में गेहूं अथवा 8 पुए रखें।

चरण 2: दीप प्रज्वलन एवं पवित्रीकरण

गाय के शुद्ध घी का चौमुखा दीपक जलाएं। अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर गंगाजल छिड़कें: $$text{ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥}$$

चरण 3: अहोई माता का पूजन

अहोई माता को रोली, चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें। माता को 8 पुए, 8 पूरियां और सिंघाड़े का भोग लगाएं।

चरण 4: संतान रक्षा संकल्प

हाथ में 7 गेहूं के दाने और पुष्प लेकर संतान की लंबी आयु और स्वास्थ्य का संकल्प करें: $$text{मम पुत्राणां/संतानानां दीर्घायुष्य, आरोग्य, ऐश्वर्यसिद्धये च अहोई अष्टमी व्रतमहं करिष्ये।}$$

5. अहोई अष्टमी की प्रामाणिक पौराणिक कथा (Sahoorkar Ki Katha)

हाथ में 7 दाने गेहूं के लेकर परिवार सहित यह पावन कथा एकाग्रचित्त होकर श्रवण करें:

प्राचीन काल में एक नगर में एक धर्मात्मा साहूकार रहता था। उसके सात बेटे और सात बहुएं थीं। दीपावली से पूर्व घर की लिपाई-पुताई के लिए उसकी सातों बहुएं जंगल में खदान से पीली मिट्टी लेने गईं।

मिट्टी खोदते समय सबसे छोटी बहू की खुरपी अचानक मिट्टी के भीतर एक मांद में बैठी स्याहू (साही/सेई) के बच्चे को लग गई, जिससे वह बच्चा वहीं मर गया। यह देखकर छोटी बहू अत्यंत दुखी हुई और पश्चाताप करने लगी।

जब स्याहू माता वहां आई और उसने अपने मृत बच्चे को देखा, तो वह क्रोधित होकर विलाप करने लगी और उसने शाप दिया— “जिसने मेरी कोख उजाड़ी है, मैं भी उसकी कोख बांधूंगी।”

स्याहू माता के इस शाप के प्रभाव से छोटी बहू की संतान जन्म लेते ही एक वर्ष के भीतर मृत्यु को प्राप्त होने लगी। इस प्रकार उसके सात पुत्र एक-एक करके काल के गाल में समा गए।

दुख से व्याकुल होकर छोटी बहू एक दिन एक विद्वान वृद्ध ब्राह्मण के पास गई और रोते हुए अपने अनजाने में हुए पाप का प्रायश्चित पूछा। ब्राह्मण ने कहा— “पुत्री! तुमने अनजाने में ही सही, परंतु स्याहू माता के बच्चे की हत्या की है। इसका एक ही निवारण है कि तुम कार्तिक कृष्ण अष्टमी को विधिपूर्वक स्याहू माता और अहोई माता का निर्जला व्रत रखो और गौ माता की सेवा करो।”

छोटी बहू ने पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत रखा। उसने दीवार पर स्याहू माता और उसके सात बच्चों का चित्र बनाकर दूध, भात और पुओं का भोग लगाया तथा क्षमा याचना की। उसने गाय और उसके बछड़े की निस्वार्थ सेवा की।

उसकी अनन्य भक्ति और पश्चाताप को देखकर स्याहू माता अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने प्रकट होकर उसका शाप हर लिया। स्याहू माता के आशीर्वाद से छोटी बहू की सभी मृत संतानें पुनः जीवित हो गईं और उसे सात दीर्घायु पुत्रों का सुख प्राप्त हुआ। तभी से संतान की लंबी आयु और रक्षा के लिए अहोई अष्टमी का व्रत पूरे भारतवर्ष में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

6. तारों को अर्घ्य देने का विधान एवं मंत्र (Stars Arghya Vidhi)

शाम को जब आकाश में तारे निकल आएं (शाम 06:12 बजे के बाद), तब कांसे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल, कच्चा दूध, रोली और अक्षत लेकर छत पर जाएं।

अर्घ्य का वैदिक मंत्र:

$$text{गगनार्णव संभूत तारागण नमोऽस्तु ते।}$$ $$text{गृहाणार्घ्यं मया दत्तं पुत्रारोग्य प्रदायकम्॥}$$ (हे आकाश रूपी सागर में चमकने वाले तारागण! आपको मेरा प्रणाम है। मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को स्वीकार करें और मेरी संतान को आरोग्य एवं दीर्घायुष्य प्रदान करें।)

अर्घ्य देने के बाद लोटे से पृथ्वी पर गिरे जल को अपनी अनामिका उंगली से छूकर अपनी आंखों और अपनी संतान के मस्तक पर लगाएं। इसके पश्चात सास के चरण स्पर्श कर बायना भेंट करें और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

7. अहोई माता की प्रामाणिक आरती (Aarti)

जय अहोई माता, जय अहोई माता। तुमको निसदिन ध्यावत, त्रिभुवन सुखदाता॥ जय अहोई माता… कार्तिक कृष्ण अष्टमी, जो व्रत कोई गावे। पुत्र दीर्घायु पावे, सब संकट टल जावे॥ जय अहोई माता… सुहागिन करे पूजा, मन इच्छा फल पावे। निःसंतान को गोदी, बालक मुस्कावे॥ जय अहोई माता…

(अन्य सभी पावन देवी-देवताओं की आरतियों के लिए हमारी पंडितदर्शन आरती संग्रह पर जाएं।)

8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. 1: अहोई अष्टमी 2026 में कब है और पूजा का शुभ समय क्या है? उत्तर: अहोई अष्टमी सोमवार, 2 नवंबर 2026 को है। पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त शाम 05:38 से 06:56 बजे तक रहेगा।

प्र. 2: अहोई अष्टमी का व्रत तारों को देखकर खोलते हैं या चांद को देखकर? उत्तर: अधिकांश क्षेत्रों में अहोई अष्टमी का व्रत शाम को तारों के दर्शन और अर्घ्य के बाद (शाम 06:12 बजे) खोल लिया जाता है। कुछ परिवारों में चंद्रोदय के बाद व्रत खोलने की परंपरा है, जिस दिन चंद्रोदय रात्रि 11:46 बजे होगा।

प्र. 3: क्या निःसंतान महिलाएं भी अहोई अष्टमी का व्रत रख सकती हैं? उत्तर: हां, संतान प्राप्ति की कामना रखने वाली महिलाएं अहोई अष्टमी के दिन निर्जला व्रत रखकर अहोई माता और भगवान शिव-पार्वती की युगल पूजा करती हैं। इस दिन मथुरा स्थित राधा कुंड में स्नान करने का विशेष महात्म्य है।

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