|| ॐ श्री गणेशाय नमः || सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः || असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय ||

करवा चौथ व्रत कथा: वीरवती एवं करवा माता की प्रामाणिक पौराणिक कथा, पूजन संकल्प व चंद्र अर्घ्य मंत्र

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
• • 📲 WhatsApp शेयर
करवा चौथ महात्म्य • संपूर्ण व्रत कथा एवं संकल्प विधान

त्वरित परिचय (Quick Summary)

करवा चौथ के पावन व्रत में व्रत कथा का श्रवण एवं पठन अनिवार्य अंग है। स्कंद पुराण के अनुसार, बिना कथा श्रवण और बिना चंद्र अर्घ्य के यह व्रत अपूर्ण माना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संध्याकाल में पूजा के समय सुहागिन महिलाएं एक साथ बैठकर यह कथा सुनती हैं।

इस लेख में सातों भाइयों की दुलारी बहन वीरवती की प्रामाणिक पौराणिक कथा, पतिव्रता करवा माता की मगरमच्छ वाली कथा, पूजा का वैदिक संकल्प मंत्र तथा चंद्र अर्घ्य एवं क्षमा प्रार्थना मंत्र पूर्ण शुद्धता के साथ प्रस्तुत हैं।

1. करवा चौथ व्रत संकल्प विधान (Sankalp Mantra)

पूजा प्रारंभ करने से पूर्व यजमान / व्रती महिला को हाथ में जल, अक्षत (अखंडित चावल), पुष्प, दूर्वा और एक सुपारी लेकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके संकल्प करना चाहिए:

संस्कृत संकल्प मंत्र:

$$\text{ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य,}$$ $$\text{अद्य श्री ब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे,}$$ $$\text{जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुक नगरे/ग्रामे (अपने नगर का नाम लें),}$$ $$\text{कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे चतुर्थी तिथौ बृहस्पति वासरे (गुरुवार),}$$ $$\text{मम अमुक गोत्रोत्पन्ना (अपना गोत्र बोलें), अमुक नाम्नी अहं (अपना नाम बोलें),}$$ $$\text{मम पत्युः दीर्घायुष्य, विपुल धन-धान्य, अखंड सौभाग्य एवं संतान सुख समृद्धये,}$$ $$\text{श्री करवा चौथ व्रतं, गौरी-गणेश, शिव-पार्वती एवं चंद्र देव पूजनं करिष्ये।}$$

(यह कहकर हाथ का जल, अक्षत और पुष्प गणेश जी और माता पार्वती के चरणों में अर्पित कर दें।)

2. कथा श्रवण के शास्त्रीय नियम

  1. हाथ में 13 दाने: कथा सुनते समय अपनी बाईं हथेली में 13 दाने गेहूं या साबुत चावल (अक्षत) अवश्य रखें।
  2. हुंकारा भरना: कथा का वाचन करते समय अन्य व्रती महिलाओं को श्रद्धापूर्वक ‘हुंकारा’ (हां-हां) भरना चाहिए; मौन रहकर या बातचीत करते हुए कथा सुनना वर्जित है।
  3. थाली फेरना (बया देना): कथा समाप्त होने पर पूजा की थाली को 7 बार घुमाया जाता है और “ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा” का पारंपरिक मंगल गान किया जाता है।
  4. दान का संकल्प: कथा के उपरांत 13 दानों को अपने पल्लू में बांध लें अथवा करवे के ढक्कन में रख दें, जिसे रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देते समय अर्पित किया जाता है।

3. प्रथम प्रामाणिक कथा: पतिव्रता वीरवती की पौराणिक कथा

प्राचीन काल में इंद्रप्रस्थ नगर में वेदधर्मा नामक एक अत्यंत तेजस्वी और धर्मपरायण ब्राह्मण निवास करते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम लीलावती था। उनके सात पुत्र और एक अत्यंत रूपवती व सुलक्षणा पुत्री थी, जिसका नाम वीरवती था। सातों भाई अपनी इकलौती बहन को प्राणों से भी अधिक स्नेह करते थे।

यथासमय वीरवती का विवाह एक सुयोग्य ब्राह्मण कुल में हुआ। विवाह के उपरांत प्रथम करवा चौथ पर वीरवती अपने मायके आई हुई थी। उसने अपनी सातों भाभियों के साथ कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को अखंड सौभाग्य की कामना से निर्जला व्रत धारण किया।

वीरवती स्वभाव से सुकोमल थी। दिन भर निर्जल रहने के कारण सायंकाल होते-होते वह भूख और प्यास से अत्यंत दुर्बल हो गई और मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ी।

यह देखकर सातों भाइयों का हृदय अत्यंत व्याकुल हो उठा। उन्होंने अपनी प्रिय बहन से कहा— “हे कल्याणी! तुम कुछ जल और फल ग्रहण कर लो, अन्यथा तुम्हारे प्राण संकट में पड़ जाएंगे।” वीरवती ने सिसकते हुए उत्तर दिया— “भाइयों! मैं सनातन धर्म की मर्यादा नहीं तोड़ सकती। मैं केवल आकाश में चंद्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्घ्य देकर ही जल ग्रहण करूंगी।”

बहन का यह दारुण कष्ट भाइयों से देखा न गया। सबसे छोटे भाई ने एक युक्ति निकाली। वह नगर से बाहर जाकर एक ऊंचे वटवृक्ष पर चढ़ गया और उसने एक विशाल छलनी के पीछे जलता हुआ एक बड़ा दीपक रख दिया। इसके पश्चात सभी भाई आकर बहन से बोले— “वीरवती! उठो, देखो आकाश में चंद्रमा उदित हो गया है। तुम छलनी से दर्शन करके अर्घ्य प्रदान कर लो।”

सरल हृदया वीरवती ने भाइयों के छल को न समझा। उसने उस कृत्रिम दीपक को ही चंद्रमा मानकर अर्घ्य दिया और जैसे ही भोजन का प्रथम ग्रास मुख में डाला, उसे छींक आ गई। दूसरे ग्रास में बाल निकला और जैसे ही उसने तीसरा ग्रास उठाया, उसी क्षण उसके ससुराल से दूत आया और उसने वज्रपात जैसा समाचार दिया कि उसके पति का प्राणांत हो गया है।

वीरवती विलाप करती हुई धरती पर गिर पड़ी और अपने बाल नोंचने लगी। उसने अन्न-जल त्याग दिया और अपने पति के शव को सुरक्षित रखकर विलाप करने लगी।

तभी वहां देवराज इंद्र की पटरानी माता इंद्राणी (शची देवी) प्रकट हुईं। वीरवती ने रोते हुए उनके चरण पकड़ लिए और पूछा— “हे देवी! मैंने तो अपने पति के लिए ही व्रत रखा था, फिर किस अपराध के कारण मेरे साथ यह अनर्थ हुआ?”

इंद्राणी देवी ने करुणापूर्वक कहा— “पुत्री! तुमने वास्तविक चंद्रोदय से पूर्व ही अपने भाइयों द्वारा दिखाए गए नकली चंद्रमा को देखकर व्रत तोड़ दिया था। इसी कारण तुम्हारा व्रत खंडित हुआ और पितरों व देवताओं का कोप हुआ।”

वीरवती ने पश्चाताप करते हुए क्षमा याचना की और उपाय पूछा। तब माता इंद्राणी ने कहा— “तुम पूरे वर्ष आने वाली प्रत्येक संकष्टी चतुर्थी का निर्जला व्रत रखो और आगामी वर्ष पुनः कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को पूर्ण शास्त्रीय निष्ठा से करवा चौथ का व्रत करो। भगवान आशुतोष और माता पार्वती की कृपा से तुम्हारा पति अवश्य जीवित होगा।”

वीरवती ने माता इंद्राणी की आज्ञा शिरोधार्य की। उसने बारह मास तक प्रत्येक चतुर्थी को नियमपूर्वक व्रत किया। जब अगला करवा चौथ आया, तो उसने अपनी भाभियों के साथ विधि-विधान से निर्जला व्रत रखा और रात में जब वास्तविक पूर्ण चंद्रमा निकला, तब छलनी से चंद्रमा और शिव परिवार का दर्शन कर अर्घ्य दिया।

वीरवती की इस अगाध तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव और माता पार्वती ने उसके पति को पुनः जीवनदान दिया और उसे सदा सुहागिन रहने का अमर वरदान प्रदान किया।

4. द्वितीय प्रामाणिक कथा: पतिव्रता करवा माता की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ‘करवा’ नाम की एक अत्यंत पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ तुंगभद्रा नदी के तट पर निवास करती थी। उसका पति एक दिन नदी में स्नान करने गया।

स्नान करते समय नदी में से एक विशाल मगरमच्छ (ग्राह) ने उसके पैर को पकड़ लिया और उसे गहरे जल में खींचने लगा। मृत्यु को निकट देखकर पति ने अपनी पतिव्रता पत्नी ‘करवा’ को पुकारा— “हे प्रिये करवा! मेरी रक्षा करो।”

पतिव्रता करवा दौड़ती हुई नदी तट पर आई। उसने अपने सतीत्व के तपोबल से कच्चे सूत के धागे से उस भयंकर मगरमच्छ को एक विशाल वटवृक्ष से बांध दिया। कच्चे सूत के उस धागे में करवा के सतीत्व की ऐसी शक्ति थी कि वह महाबली मगरमच्छ टस से मस न हो सका।

इसके पश्चात करवा सीधे यमराज के दरबार में पहुंची। उसने यमराज से कहा— “हे धर्मराज! उस मगरमच्छ ने मेरे निर्दोष पति का पैर पकड़ा है। आप अपनी शक्ति से उस दुष्ट मगरमच्छ को मृत्युदंड देकर नरक में भेजें और मेरे पति को पूर्ण आयु प्रदान करें।”

यमराज ने कहा— “हे देवी! उस मगरमच्छ की आयु अभी शेष है, जबकि तुम्हारे पति की आयु पूर्ण हो चुकी है। अतः मैं विधि के विधान के विरुद्ध नहीं जा सकता।”

तब पतिव्रता करवा ने क्रोधित होकर कहा— “हे यमराज! यदि आपने मेरे पति की रक्षा नहीं की और उस पापी मगरमच्छ को दंड नहीं दिया, तो मैं अपने पतिव्रत धर्म के तपोबल से आपको ही शाप दे दूंगी।”

एक सती स्त्री के शाप से भयभीत होकर यमराज स्वयं पृथ्वी पर आए। उन्होंने उस मगरमच्छ को यमलोक भेजकर मृत्युदंड दिया और करवा के पति को चिरायु होने का वरदान दिया। यमराज ने प्रसन्न होकर करवा से कहा— “हे करवा! तुम्हारे सतीत्व और साहस के कारण आज से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का दिन तुम्हारे नाम से ‘करवा चौथ’ कहलाएगा। जो भी सौभाग्यवती स्त्री इस दिन तुम्हारा और भगवान शिव-पार्वती का पूजन कर चंद्रमा को अर्घ्य देगी, उसके पति की अकाल मृत्यु से रक्षा होगी और उसका सुहाग अखंड रहेगा।”

5. संपूर्ण चंद्र अर्घ्य एवं क्षमा प्रार्थना मंत्र

कथा श्रवण के उपरांत रात्रि में चंद्र दर्शन के समय निम्नलिखित मंत्रों का उच्चारण करें:

1. चंद्र अर्घ्य मंत्र (तांबे के लोटे से जल देते हुए):

$$\text{क्षीरोदार्णव सम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भव।}$$ $$\text{गृहाणार्घ्यं मया दत्तं रोहिण्यासहितो मम॥}$$ $$\text{ॐ सोमाय नमः। ॐ चंद्रमसे नमः। ॐ रोहिणीकान्ताय नमः।}$$

2. अखंड सौभाग्य प्रार्थना मंत्र:

$$\text{देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।}$$ $$\text{रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥}$$

3. अपराध क्षमापन मंत्र (भूल-चूक क्षमा हेतु):

$$\text{आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।}$$ $$\text{पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥}$$ $$\text{अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।}$$ $$\text{दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व जगदम्बिके॥}$$

6. संबंधित आंतरिक कड़ियाँ (Internal Linking)

शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

इस अनुष्ठान एवं दैनिक साधना हेतु आवश्यक प्रामाणिक सामग्री

कर्मकांडी आचार्यों के परामर्श अनुसार पूजा-पाठ में केवल शुद्ध धातु के पात्र एवं प्रामाणिक धर्मग्रंथों का ही उपयोग करना चाहिए:

★ 4.9 • गीताप्रेस गोरखपुर
श्रीमद्भगवद्गीता (साधक संजीवनी)
स्वामी रामसुखदास जी टीका (₹450)
अमेज़न पर देखें ↗
★ 4.8 • हरिद्वार प्रमाणित
5-मुखी रुद्राक्ष जाप माला
108+1 मनके वैदिक जाप हेतु (₹499)
अमेज़न पर देखें ↗
शुद्ध पीतल पंचमुखी दीपक, हवन पात्र एवं गंगाजल संग्रह देखें। संपूर्ण पूजा सामग्री भंडार देखें →
पंडित दर्शन - सनातन ज्ञान केंद्र

यदि आपको यह विधि या लेख उपयोगी लगा हो, तो अपने परिजनों व मित्रों के साथ साझा करें।

📲 परिजनों को शेयर करें

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *