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दीपावली पूजन के बाद चौकी कब और कैसे हटाएं? कलश के नारियल, अक्षत, सिक्के व पुरानी मूर्ति विसर्जन के संपूर्ण शास्त्रोक्त नियम

✍️ लेखक: पंडित शिवम तिवारी
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दीपावली पूजन के बाद चौकी कब हटाएं कलश के नारियल चावल सिक्के व पुरानी मूर्ति विसर्जन नियम दिव्य बैनर

दीपावली पूजन के बाद चौकी व सामग्री विसर्जन: दीपावली की पावन महानिशीथ रात्रि में वैदिक षोडशोपचार विधि से महालक्ष्मी, भगवान गणेश, मां सरस्वती और कुबेर देव का विधिवत पूजन-अर्चन तो प्रत्येक श्रद्धालु पूरे भक्तिभाव से करता है। परंतु पूजन संपन्न होने के उपरांत अधिकांश परिवारों के सम्मुख यह सबसे बड़ा धर्मसंकट और असमंजस खड़ा होता है कि—पूजा की चौकी को किस दिन और किस समय हटाना चाहिए? कलश के ऊपर रखे पावन नारियल और जल का क्या करें? अक्षत, कौड़ी, गोमती चक्र और चांदी के सिक्कों को तिजोरी में कब और कैसे रखें? तथा पुरानी मिट्टी व धातु की मूर्तियों का क्या किया जाए?

सनातन धर्म के प्रामाणिक कर्मकांड ग्रंथों जैसे निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु और कर्मकांड प्रदीप में विसर्जन के अत्यंत कठोर और स्पष्ट नियम प्रतिपादित किए गए हैं। यदि पूजा के बाद चौकी गलत समय पर उठाई जाए या कलश की सामग्री का अनादर हो, तो की गई संपूर्ण पूजा का फल निष्फल हो जाता है और घर में अलक्ष्मी (दरिद्रता) का वास हो सकता है। आइए, पंडित दर्शन के इस शोधपरक आलेख में समझें दिवाली चौकी हटाने की सही शास्त्रोक्त विधि और प्रत्येक सामग्री का यथार्थ नियम।

⚠️ मुख्य नियम: दिवाली की रात चौकी कभी न हटाएं

दीपावली की रात स्थिर लग्न में स्थापित चौकी को उसी रात भूलकर भी नहीं हटाना चाहिए। मान्यता है कि दीपावली की रात्रि में माता लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करती हैं और जिस घर में उनकी चौकी अखंड दीप के साथ सुशोभित होती है, वहां वे स्थिर रूप से निवास करती हैं। चौकी कम से कम अगले दिन प्रातःकाल तक या भाई दूज तक यथास्थान रहनी चाहिए।

पूजा की चौकी कब उठानी चाहिए? (शुभ दिन व समय)

शास्त्रों के अनुसार दीपावली पूजन की चौकी हटाने के लिए तीन प्रमुख विकल्प मान्य हैं:

  1. प्रथम विकल्प (गोवर्धन पूजा के दिन – प्रतिपदा): दिवाली के अगले दिन यदि सूर्य ग्रहण या सूतक न हो, तो गोवर्धन पूजा के दिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात शुभ चौघड़िया (अमृत या शुभ) में चौकी का विसर्जन और सामग्री का व्यवस्थापन किया जा सकता है।
  2. द्वितीय विकल्प (भाई दूज के बाद – यम द्वितीया – सर्वश्रेष्ठ विधान): उत्तर भारत और वैष्णव परंपरा में अधिकांश आचार्य भाई दूज की पूजा संपन्न होने के बाद (दिवाली के तीसरे दिन) ही चौकी हटाने की संस्तुति करते हैं। इस पूरी अवधि (अमावस्या से द्वितीया) को ‘दीपावली पंचमहोत्सव’ कहा जाता है। भाई दूज के अगले दिन प्रातःकाल चौकी उठाना सर्वाधिक मंगलकारी माना जाता है।
  3. समय का नियम: चौकी सदैव प्रातःकाल सूर्योदय के बाद अथवा दोपहर 12 बजे से पहले (अभिजीत मुहूर्त या चर, लाभ, अमृत चौघड़िया में) ही उठानी चाहिए। सूर्यास्त के बाद या संध्याकाल में कभी भी चौकी नहीं हटाई जाती।

चौकी हटाने से पूर्व अनिवार्य वैदिक विसर्जन विधि

सीधे हाथ लगाकर प्रतिमाएं या कलश हटाना वर्जित है। पहले विधिवत देवताओं को सादर विदा किया जाता है:

  1. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और चौकी के सम्मुख घी का एक दीपक व अगरबत्ती जलाएं।
  2. हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर सभी देवी-देवताओं को प्रणाम करें और पूजा में जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
  3. निम्नलिखित विसर्जन मंत्र का पाठ करते हुए हाथ के अक्षत-पुष्प देवताओं के चरणों में अर्पित करें:

॥ देव विसर्जन मंत्र ॥

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकामप्रसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च॥

हिंदी भावार्थ: हे समस्त पूजित देवगण! आप मेरी इस पूजा को प्रीतिपूर्वक स्वीकार करें और मेरे मनोरथों को सिद्ध करते हुए पुनः आगमन के लिए अपने-अपने दिव्य लोकों को प्रस्थान करें।

इसके पश्चात चौकी को अपने दाहिने हाथ से हल्का सा उत्तर दिशा की ओर खिसका दें। कर्मकांड में चौकी को थोड़ा हिलाना या खिसकाना ही पूजा के पूर्ण होने और देवताओं के प्रस्थान का शास्त्रीय संकेत होता है।

कलश की प्रत्येक सामग्री का क्या करें? (विस्तृत शास्त्रोक्त सूची)

सामग्री का नाम शास्त्रोक्त व्यवस्थापन विधि क्या भूलकर भी न करें
कलश का जल आम के पत्तों अथवा दूर्वा से पूरे घर के कमरों, मुख्य द्वार और तिजोरी पर छिड़कें। यह घर का वास्तु शुद्ध करता है। शेष जल को तुलसी के पौधे या किसी गमले में अर्पित करें। सींक, नाली या पैरों में कभी न बहने दें।
कलश का नारियल (श्रीफल) यदि नारियल पर लाल चुनरी बंधी है, तो उसे मां लक्ष्मी का साक्षात स्वरूप माना जाता है। इसे लाल रेशमी वस्त्र में लपेटकर पूरे वर्ष अपनी तिजोरी या पूजा घर में रखें। अथवा इसे प्रसाद के रूप में केवल परिवार के सदस्यों में बांटकर ग्रहण करें। कचरे में न फेंकें; बाहरी अनिष्ट व्यक्ति को न दें।
कलश के नीचे रखे अक्षत (चावल) कलश की स्थापना जिस चावल की ढेरी (अष्टदल कमल) पर की गई थी, उन पवित्र अक्षतों को अपने घर के अन्न भंडार (चावल के मुख्य डिब्बे) में मिला दें। इससे मां अन्नपूर्णा की कृपा से अन्न में बरकत बनी रहती है। थोड़े अक्षत पक्षियों को भी डाल सकते हैं। पैरों के नीचे न आने दें।
चांदी का सिक्का व सुपारी चांदी के सिक्के को गंगाजल से धोकर कुमकुम का तिलक लगाएं और लाल कपड़े में लपेटकर अपनी तिजोरी, लॉकर या गल्ले में स्थायी रूप से रखें। पूजा की सुपारी को अपने नियमित पूजा मंदिर में भगवान गणेश के रूप में स्थापित रखें। सिक्के को सामान्य खर्च में खर्च न करें।
आम/अशोक के पत्ते व पुष्प फूलों और पत्तों को सूखने के बाद किसी पवित्र बहती नदी में विसर्जित करें या घर के गमले की मिट्टी खोदकर उसमें दबा दें ताकि वह प्राकृतिक खाद बन सके। कचरे के डिब्बे में सीधे कभी न डालें।

दिवाली की सिद्ध कौड़ी, गोमती चक्र व कुबेर पोटली का नियम

दीपावली की पूजा में रखी गई पीली कौड़ियां, गोमती चक्र, एकाक्षी नारियल और कमलगट्टे साक्षात महालक्ष्मी को आकर्षित करने वाले दिव्य यंत्रवत तत्व हैं। पूजा संपन्न होने के बाद:

  • एक नया लाल या पीला रेशमी कपड़ा लें।
  • उसमें 5 पीली कौड़ियां, 3 गोमती चक्र, 1 कमलगट्टा, 1 हल्दी की गांठ और 1 चांदी का सिक्का रखें।
  • इस पोटली को धूप-दीप दिखाकर ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं नमः’ मंत्र का 11 बार जप करें।
  • इस सिद्ध कुबेर पोटली को अपनी व्यापारिक तिजोरी अथवा घर के मुख्य धन स्थान पर उत्तर दिशा में स्थापित करें। इसे पूरे वर्ष वहीं रहने दें; अगले वर्ष दिवाली पर इसे पुनः सिद्ध किया जाता है।

पुरानी लक्ष्मी-गणेश जी की मूर्तियों का क्या करें?

हर वर्ष दिवाली पर नई प्रतिमाएं लाने के बाद पुरानी मूर्तियों के संबंध में शास्त्रों में स्पष्ट भेद है:

  • मिट्टी की पुरानी मूर्तियां: मिट्टी की प्रतिमाओं का विसर्जन अनिवार्य है। इन्हें किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुएं के स्वच्छ जल में आदरपूर्वक विसर्जित करें। यदि शहर में नदी उपलब्ध न हो, तो घर के किसी बड़े गमले या स्वच्छ जल के पात्र में मूर्ति को गला दें और उस पावन मिट्टी को किसी पौधे (तुलसी को छोड़कर) की जड़ में डाल दें। किसी पेड़ के नीचे लावारिस छोड़कर न आएं।
  • धातु (पीतल, अष्टधातु, चांदी) की मूर्तियां: धातु की मूर्तियों का कभी भी विसर्जन नहीं किया जाता। दिवाली की पूजा के बाद उन्हें पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराकर पुनः अपने नित्य पूजा घर में स्थापित कर देना चाहिए।
  • चौकी पर बिछा लाल वस्त्र: इसे धोकर संभाल कर रख लें। इसका उपयोग आप आगामी किसी भी मांगलिक अनुष्ठान, नवरात्रि या अगली दिवाली पर पुनः कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

प्रश्न 1: यदि कलश का नारियल अंदर से सूखा या खराब निकल जाए तो क्या कोई अपशकुन होता है?

उत्तर: कदापि नहीं। शास्त्रों में मान्यता है कि यदि पूजा का श्रीफल अंदर से सूखा या जल-रहित निकले, तो इसका अर्थ है कि देवी ने आपकी पूजा और हवि को पूर्णतः स्वीकार कर लिया है। इसे किसी नदी में प्रवाहित कर दें अथवा मिट्टी में दबा दें। किसी अनिष्ट की आशंका न पालें।

प्रश्न 2: क्या दिवाली की बची हुई खील-बताशे का भी विसर्जन करना पड़ता है?

उत्तर: नहीं, खील-बताशे महालक्ष्मी का साक्षात प्रसाद हैं। इन्हें परिवार के सभी सदस्यों, पड़ोसियों और अतिथियों में आदरपूर्वक बांटकर खाना चाहिए। यदि अधिक मात्रा में बच जाएं, तो इन्हें गाय माता को खिलाना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है।

प्रश्न 3: क्या शाम के समय या रात्रि में चौकी उठाई जा सकती है?

उत्तर: शास्त्रों में सूर्यास्त के पश्चात चौकी उठाने का सख्त निषेध है। संध्याकाल में देवी-देवताओं की आरती और विश्राम का समय होता है। चौकी सदैव प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त से लेकर दोपहर के शुभ अभिजीत काल के मध्य ही उठाई जानी चाहिए।

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शास्त्रोक्त अनुष्ठान सामग्री प्रामाणिक स्रोत • गीताप्रेस गोरखपुर

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पंडित दर्शन - सनातन ज्ञान केंद्र

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